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Sunday, 3 February 2019

Samudragupta Bharat ka ajay shasak

Samudragupta भारत का एक ऐसा शासक था, जो अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा। Samudragupta ने भारत के ऐसे युग की स्थापना की जो आज भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग कहाँ जाता है।
आज इस पोस्ट में हम इसी महान योद्धा, कलाप्रेमी और साहित्यप्रेमी शासक samudragupta के बारे में जानेगे। 

गुप्त साम्राज्य से पहले भारत 

चन्द्रगुप्त मौर्य ने जिस मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी उसने भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में बंधा पर जब इस साम्राज्य का पतन हुआ तो उसके बाद हमारा देश फिर से अलग अलग राज्यों में बट गया। 200 b. c से 300A.D का समय भारतीय इतिहास में मौर्योत्तर काल कहाँ जाता है इस काल में शुंग वंश,सातवाहन वंश जैसे भारतीय वंशो ने और यवन, शक और कुषाण जैसे विदेशी शासको ने राज किया। इस काल में पुष्यमित्र शुंग, गौतमीपुत्र  शातकर्णि और कनिष्क जैसे अच्छे राजा हुए परन्तु ये सब भारत को राजनैतिक एकता देने में सफल नहीं हुए। 

गुप्त वंश की उत्पति 

गुप्त वंश की उत्पति के बारे में विद्वानों में मतभेद है। डॉ गोरीशंकर ओझा ने इन्हे क्षत्रिय माना है और हेमचन्द्रराय चौधरी ने इन्हे ब्राह्मण माना है लेकिन रोमिला थापर, रामशरण शर्मा ने इन्हे वैश्य माना है। अधिकांश विद्वान ने इन वैश्य माना है। 
            गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था परन्तु चन्द्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण करी और इसने ही अपने आप को स्वतंत्र शासक घोषित किया और स्वतंत्र गुप्त साम्राज्य की स्थापना करी। 

Samudragupta की जीवनी 

                                               
samudragupta
समुद्रगुप्त 

प्रारंभिक जीवन 

Samudragupta, चन्द्रगुप्त प्रथम  और रानी कुमारदेवी का पुत्र था। समुद्रगुप्त  बचपन से ही बहुत मनोहर था उसने कम समय ही शस्त्र संचालन , अस्त्र संचालन सीख लिया। 

उत्तराधिकार लिए युद्ध 

चन्द्रगुप्त ने  जीवन काल  में ही समुद्रगुप्त को शासक बना दिया और  स्वं ने सन्यास ले लिया। लेकिन उसके भाइयो  विरोध किया इसलिए समुद्रगुप्त  भाइयो से युद्ध करना पड़ा और अंत में वह विजय हुआ। 
समुद्रगुप्त का शासन काल 340 A.D. से लेकर 380 A.D तक चला। 

समुद्रगुप्त की विजय  

उत्तर भारत पर प्रथम  आक्रमण 

समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम गंगा यमुना दोआब के राज्यों  किया। इसने पद्मावत के राजा नागसेन को हराया और फिर पाटलिपुत्र के कोटकुल राजा को हराया और पाटलिपुत्र  पर अधिकार कर लिया। पाटलिपुत्र पर अधिकार करने से समुद्रगुप्त की साम्राज्य विस्तार की इच्छा और प्रबल हो गई और उसने दिग्विजय अभियान का आरम्भ किया। 

उत्तर भारत पर पुनः आक्रमण 

प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त  उत्तर भारत के 9 राज्यों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया था  सभी राजाओ को राज्यों को गुप्त साम्राज्य में मिला दिया गया। 
समुद्रगुप्त ने जिन 9 राजाओ  हराया उनके नाम है -:
  1. रुद्रदेव 
  2. मतील 
  3. नागदत्त 
  4. चन्द्रवर्मन 
  5. गणपति नाग 
  6. नागसेन 
  7. अय्यूत 
  8. नन्दिन 
  9. बल शर्मा

  अटवी राज्यों पर आक्रमण 

उत्तरी भारत की विजय के बाद समुद्रगुप्त ने विंध्याचल पर्वत के आसपास के अटवी राज्यों पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त की। इन अटवी राज्यों में जंगली जातिया निवास करती थी। यह अटवी राज्य गाज़ीपुर से लेकर  जबलपुर तक फैले थे। इन राज्यों के राजा के प्रति समुद्रगुप्त ने परचारिकीकृत की निति को अपनाया, इस निति के तहत वह उन राज्यों को अपना सेवक बना देते थे। इन राज्यों को जितने से उसके दक्षिण के राज्यों को जितने का मार्ग प्रशस्त हो गया। 

दक्षिण भारत पर आक्रमण 

अटवी राज्यों को जितने के बाद समुद्रगुप्त ने दक्षिण के राज्यों पर हमला किया और इन राज्यों को भी पराजित कर दिया। जिन दक्षिणी राज्यों को उसने हराया उन राज्यों के नाम है-:
  1. कौशल का महेंद्र 
  2. महाकांतार का व्याघ्रराज 
  3. पिष्टपुर का महेन्द्रगिरि 
  4. कोटूर का स्वामीदत्त 
  5. कांची का विष्णुगुप्त 
  6. अवमुक्त का नीलराज 
  7. वेगी का हस्तिवर्मा 
  8. पालक्क का उग्रसेन 
  9. देवराष्ट्र का कुबेर 
  10. कुशस्थलपुर का धनजय 
समुद्रगुप्त ने कूटनीति का प्रयोग करके इन राज्यों के प्रति धर्म विजय की निति अपनाई इस निति के अनुसार वो हारे हुए राजा के राज्यों को अपने साम्राज्य में नहीं मिलता लेकिन उन राज्यों को हमेशा समुद्रगुप्त को कर देना पड़ता था। 

सीमांत प्रदेशो और गणराज्यो पर विजय 

समुद्रगुप्त की सैनिक शक्ति को देखकर सीमांत प्रदेशो और गणराज्यो ने बिना किसी युद्ध के अधीनता स्वीकार कर ली। वो सीमांत प्रदेश जिसने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली वो थे -:
  1.  समतट 
  2.  डवाक 
  3. कामरूप 
  4. नेपाल 
  5. कात्रिपुर
गणराज्य जिन्होंने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करि वे थे -:
  1. मालवा 
  2. आर्जुनायन 
  3. योधेय 
  4. माद्रक 
  5. आभीर 
  6. प्रार्जन 
  7. सनकानिक 
  8. खरपारिक 

समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार 

samudragupta
source ipfs
ऊपर दिए गए नक़्शे ने फीका नीला रंग का क्षेत्र है वो सभी समुद्रगुप्त ने विजय किया था। डॉ आर. सी. मजूमदार के अनुसार समुद्रगुप्त का साम्राज्य में कश्मीर, पश्चिमी राजस्थान, सिंध और गुजरात को छोड़ कर पूरा भारत सम्मेलित था और छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा पूर्वीतट के साथ साथ दक्षिण  पिंगलपट सम्मेलित थे। 

अश्वमेघ यज्ञ 

समुद्रगुप्त ने अपनी भारत विजय के बाद उसने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। इस आयोजन में समुद्रगुप्त ने खूब दान पुण्य किया और सोने के सिक्को को जारी किया।  इन सिक्को के एक  तरफ यज्ञ के अश्व की मूर्ति है और दूसरी तरफ समुद्रगुप्त की  महारानी चवर लिए खड़ी है और उस सिक्के पर लिखा है "अश्वमेघ पराक्रमण "

समुद्रगुप्त द्वारा जारी किये गए सिक्के 

समुद्रगुप्त ने अपने राज्य काल में 6 प्रकार के सोने के सिक्के जारी किये 
  1. ध्वज धारी - यह समुद्रगुप्त का सर्वाधिक प्रसिद्ध मुद्रा है। इस मुद्रा ने इनको 100 युद्धों  विजेता बताया गया है। 
  2. धनुर्धारी प्रकार - इस मुद्रा  समुद्रगुप्त धनुष धारण किए हुए है और इस मुद्रा पर इसकी उपाधि "अप्रतिरथ " अंकित है। 
  3. परशुधारी प्रकार - इस पर राजा परशु धारण किये हुए दर्शाया गया है। 
  4. अश्वमेघ प्रकार -  इस मुद्रा को समुद्रगुप्त  ने अश्वमेघ यज्ञ के बाद जारी किया  था। 
  5. व्याघ्र निः हता प्रकार - इस मुद्रा के माध्यम से समुद्रगुप्त का आखेट प्रेम दिखता है और इस मुद्रा पर "व्याघ्रपराक्रम" और  "राजा समुद्रगुप्त" की उपाधि मिलती है। 
  6. विणा वादन प्रकार - इस मुद्रा में समुद्रगुप्त को विणा बजाते हुए दिखाया गया है। इस मुद्रा के माध्यम से हमें समुद्रगुप्त का कला प्रेम दीखता है। 

समुद्रगुप्त का चरित्र चित्रण 

  1. वीर योद्धा - समुद्रगुप्त एक वीर और पराक्रमी शासक था। उसने उत्तर भारत के 9 राज्यों और दक्षिण भारत के 12 राज्यों को पराजित किया। इसके साथ हे उसने अटवी राज्यों को हरा कर एक अखंड भारत का निर्माण करने की कोशिस की। उसने अश्वमेघ यज्ञ करके अपनी शक्ति  प्रदर्शन किया। 
  2. योग्य शासक -समुद्रगुप्त न सिर्फ एक वीर योद्धा अपितु एक योग्य शासक भी था। उसने अपने प्रशासन को सुव्यवस्थीत बनाया और अपने राज्य में शांति  की स्थपना करि। यह एक प्रजावत्सल राजा थे इसलिए ये हमेशा अपनी प्रजा की नैतिक और भौतिक प्रग्रति  लिए प्रयत्नशील रहते थे। 
  3. कूटनीतिज्ञ - समुद्रगुप्त एक  कूटनीतिज्ञ थे ,वे समय के हिसाब से आचरण करना जानते थे। इन्होने जब दक्षिण विजय किया  तब उन्होंने उत्तर भारत की तरह उन राज्यों को अपने साम्राज्य में सम्मलित नहीं और उन्हें अपना करद बना कर छोड़ दिया। ऐसा इन्होने इसलिए किया क्योकि उस समय यातायात साधन इतने नहीं थे और पाटलिपुत्र से दक्षिण में राजव्यवस्था संभालना असंभव था। 
  4. साहित्य और कला के संरक्षक - समुद्रगुप्त न सिर्फ राजकार्यो में अपितु कला में भी बहुत माहिर था। इसलिए इन्हे कविराज भी कहा जाता था। समुद्रगुप्त ने कई विद्वानों को  संरक्षण दिया। हरिषेण , असक और वशुबन्ध इनके दरबार के विद्वान् थे। 
  5. धर्म-सहिष्णु - समुद्रगुप्त स्वं हिन्दू धर्म का समर्थक था और इसके समय में भागवत धर्म का बहुत विकाश हुआ। लेकिन उसने कभी भी अपने साम्राज्य में दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ कभी को निर्णय नहीं लिया अपतु उसने बोधगया में बौद्ध विहार बनाने की अनुमति दी। इसके साथ ही इसके दरबार के असक और वशुबन्ध दोनों ही बौद्ध धर्म के अनुयाई थे। 

क्या समुद्रगुप्त को भारतीय नेपोलियन कहना सही है?


डॉ बी. ए. स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारतीय नेपोलियन कहा था। उसके बाद कई विद्वान् इस बात से सहमत होकर इस बात को मानने लग गए और फिर स्कूल की किताबो में भी  समुद्रगुप्त को नेपोलियन कहाँ जाने लगा जिस कारण से आज उसे  अधिकांश लोग भारतीय नेपोलियन कहते है। लेकिन अगर सही मायने में नेपोलियन और समुद्रगुप्त की तुलना की जाए तो शायद यह बात सामने आ जाएगी की समुद्रगुप्त के सामने नेपोलियन कुछ भी नहीं था। ऐसा इसलिए क्योकि नेपोलियन वॉटरलू की लड़ाई में हारा था लेकिन समुद्रगुप्त आजीवन अजय रहा और कोई भी युद्ध नहीं हारा। किसी बात को इसलिए मान लेना की वो सही है क्योकि वो किसी अंग्रेजी विद्वान् ने कही है तो यह न सिर्फ हमारी भारतीयता पर परन्तु अपने उन समुद्रगुप्त जैसे महान पूर्वजो के सम्मान पर कलंक है। 
इस पोस्ट में मेने आप को भारत के एक महान सम्राट समुद्रगुप्त के बारे में बताया और यह भी बताया की क्या उन्हें नेपोलियन कहना सही है या नहीं। अब आप की बारी है अगर आपको यह पोस्ट पसंद आए तो शेयर जरूर करेगा  कमेंट करके बताए की आपको और किस व्यक्ति पर पोस्ट चाहिए। 

Source 

                



Wednesday, 16 January 2019

Sardar Vallabhbhai Patel और Statue of Unity से जुड़ी रोचक जानकारी जो आपको जाननी जरूरी है

                                                                 
Sardar vallabhai patel
sardar vallabhbhai patel 
आज कहानी एक ऐसे व्यक्ति की जिसने अपनी सूझबूझ और अपनी बुद्धिमानी से 562 रियासतों में बटे Bharat को एक किया और जिस देश को हम आज देख रहे है उसका गठन किया। आज हम उस व्यक्ति के बारे में जानेगे जिसने सत्ता से ज्यादा देश को सर्वोपरी रखा। आज हम जानेगे एक ऐसे Gujarati के बारे में जिसे दुनिया Sardar के नाम से जानती है।
                                                     तो चलिए जानते है Bharat के पहले गृहमंत्री Sardar Vallabhbhai Patel के बारे में और जानते है हाल ही में बने दुनिया के सबसे बड़े Statue 'Statue Of Unity' के बारे में। 
                                                          अगर यह पोस्ट आपको पसंद आए तो आप इस पोस्ट को ऊपर दिए के शेयर बटन से शेयर करे  कमेंट करके बताए की यह पोस्ट आपको कैसी लगी। 

प्राम्भिक जीवन 

Sardar Patel का जन्म और उनके माता पिता 

Sardar Vallabhbhai Patel की जन्म तारीख के बारे में उनको खुद भी पता नहीं था इसलिए उन्होंने मेट्रिक की परीक्षा में प्रवेश करने के लिए अपनी जन्म तारीख 31 अक्टूबर 1875 लिखा। उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल और माता का नाम लाड़बाई था। 

 Sardar Patel की शिक्षा 

Sardar Patel ने अपनी प्राम्भिक शिक्षा गुजराती माध्यम से ली और 1897 में  अपनी उच्च विधालय पास किया और वकालत की पढाई करने लगे। सन 1910 वे वकालत की पढाई के लिए इंग्लैंड चले गए और १९१३ में पढाई करके Bharat लोट आए। 

Sardar Patel का पारिवारिक जीवन   

सन 1897 Sardar Patel का विवाह जावेरबाबेन पटेल से हुआ। सन 1904 में इनके यहाँ एक बेटी का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया मणिबेन और 1906 में इनके यहाँ एक बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया ददयाभाई। सन 1909 में इनकी पत्नी को मुंबई के Hospital में cancer के इलाज के लिए भर्ती कराया गया और वही उनकी मृत्यु हुई। जब उनकी मृत्यु की सुचना Sardar Patel को मिली  तब Sardar Patel Court में गवाह से पूछताझ कर रहे थे उन्हें खत पढ़ा और जेब में रखकर वापिस सवाल जबाब करने लगे और उन्होंने उस case  भी लिया।  पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने पुनः विवाह करने  मना कर दिया  बच्चो को सँभालने का निर्णय लिया।
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Sardar Patel का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान 

सन 1917  Sardar Patel को गुजरात सभा का secretary चुना गया और सन 1918 में खेड़ा सत्याग्रह में  उन्होंने गाँव-गाँव घूम-घूम कर किसानों से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कराया कि वे अपने को झूठा कहलाने और स्वाभिमान को नष्ट कर जबर्दस्ती बढ़ाया हुआ कर देने की अपेक्षा अपनी भूमि को जब्त कराने के लिये तैयार हैं। ब्रिटिश सरकार को किसानो के सामने झुकना पड़ा और उनका ऋण माफ़ करना पड़ा। सन 1921 में जब महात्मा गाँधी ने  जब non cooperation movement शुरू किया तब वे देश भर में घूम घूम कर आंदोलन का प्रचार किया और 300000 मेंबर और Rs 1. 5 million collect किए। 
                                                               सन 1928 में बारडोली के किसानो पर अंग्रेज़ी सरकार ने कर वृद्धि कर दी। तब Sardar Patel ने किसानो को कर न देने के लिए कहा तब अंग्रज़ी सरकार ने किसानो की जमीन जब्त कर ली फिर भी  किसानो ने छः महीने तक आंदोलन किया और अंत   झुकना पड़ा। 
                                                                   सं 1930 में नमक सत्याग्रह के समय जेल में डाल दिया गया।  उन्होंने गांधी जी की अनुपस्थिति ने सत्याग्रह को पूरी निष्ठां के साथ आगे बढ़ाया और सं 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने पुरे भारत में घूम कर राष्ट्रीय भावना  प्रचार  किया और  इस कारण से उन्हें  फिर से जेल में डाल दिया गया  उन्हें 1945 में छोड़ा गया। 

भारत का एकीकरण और Sardar Patel 

जब 1947 में अंग्रेज़ो ने Bharat छोड़ने का निर्णय लिया तब तो उस समय के वाइसराय लार्ड मौन्टबेटन ने Bharat में बढ़ती साम्प्रदायिकता देखते हुए अखंड Bharat के दो टुकड़े कर दिए एक bharat और दूसरा पाकिस्तान और सभी तत्कालीन रजवाड़ो को कहा की वो चाहे तो भारत  शामिल हो या पाकिस्तान में या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखे।  
                                               तब कांग्रेस ने भारत के एकीकरण की जिम्मेदारी सरदार पटेल को दी और उन्होंने 6 अगस्त 1947 को भारत के  एकीकरण का कार्य शुरू किया और 14 अगस्त 1947 को जम्मू-कश्मीर , जूनागढ़ और हैदराबाद के निज़ाम को छोड़ कर सभी रजवाड़े भारत में सम्मलित हो गए।
                                                         सरदार पटेल जनमत संग्रह करके जूनागढ़ रियासत को भारत में मिला दिया और वहा का नवाब अपनी रियासत छोड़ कर पाकिस्तान चला गया और हैदराबाद का निज़ाम अपने आप  स्वतंत्र रखना चाहता था तब सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर हैदराबाद पर कब्ज़ा किया। 
                                                    जम्मू कश्मीर के महाराजा भी अपने आप को स्वतंत्र रखना चाहते थी लेकिन पाकिस्तान  से उनके राज्य में घुस पैठ होने लगी तब उन्होंने भारत सरकार से मदद मांगी तब सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर पाकिस्तानी घुसपैठियो को खदेड़ दिया परन्तु जब तक सेना उन्हें पूरी तरह बहार निकाल पाती तब तक जवाहर लाल नेहरू ने इस मुद्दे को UNO को दे दिया और यह विवाद वर्तमान समय तक चल रहा है। 

Sardar Patel को समर्पित Statue Of Unity 

 इतिहास 

7 अक्टूबर 2010 को भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जो जी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होंने एक press conference में Statue Of Unity के निर्माण की घोषणा करी थी। तब इस project के निर्माण के लिए गुजरात सरकार ने "सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट " बनाया। 
                                              इस कार्य को आगे बढ़ने के लिए स्टेचू ऑफ़ यूनिटी मूवमेंट चलाया गया जिसकी मदद से मूर्ति के निर्माण के लिए लोहा एकत्र किया गया। इस लोहे को एकत्र करने के लिए किसानो को उनके पुराने लोहे के औज़ार देने के लिए निवेदन किया गया। अतः 2016 तक लगभग 135 metric tonne इस्तेमाल किया गया लोहा एकत्र हुआ और उसमे से लगभग 109 tonne मूर्ति के निर्माण  प्रयोग किया गया। 
                                            इस project के समर्थन में 15 दिसंबर 2013 को सूरत में Run for Unity का आयोजन किया गया। 

  Design और Funding 

देश  इतिहासकार , मूर्तिकार और कलाकार सभी ने मिलकर सरदार पटेल के अलग अलग मूर्तियों को अध्यन करने के बाद इन  सभी ने देश के जाने माने मूर्तिकार श्री राम वानजी सुथार के बनाये हुए design को मंजूरी दी। 
     इस प्रोजेक्ट का निर्माण निजी और सरकारी साझेदारी हुआ। इस प्रोजेक्ट में  अधिकांश पैसा गुजरात सरकार में लगाया, गुजरात सरकार ने Rs. 6 billion का बजट 2012 -2015 के बीच इस प्रोजेक्ट में लगाया और 2015 -16 के केन्द्रीय बजट में इसके लिए Rs. 2 billion दिए गए। 

 Statue Of Unity से जुड़े रोचक जानकारी 

                                       
statue of unity
Statue Of unity 
     

  1. Statue Of Unity की हाइट 182 मीटर है और इसका निर्माण लगभग 3 साल और 6 महीने में हुआ जो की दुनिया के दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति The Spring Buddha के बनने के समय से लगभग आधी है और Statue Of Liberty के निर्माण समय से लगभग 4 साल कम है। 
  2. इसके निर्माण के बाद ये लगभग 15000 आदिवासी लोगो सीधा रोज़गार देगी। 
  3. ये मूर्ति 60 मीटर प्रति सेकंड के वायु आवेग को और भूकंप को भी सहन कर सकती है। 
  4.  एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिसम्बर 2018 में स्टेचू ऑफ़ यूनिटी को देखने के  लगभग 2.97 लाख लोग आए और Rs. 6.38 करोड़ की कमाई हुई।     

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Monday, 5 November 2018

Five Facts You Never Knew About Bhamashah in hindi

Rajasthan का इतिहास में शौर्य गाथा ,वीरता , देशभक्ति है और यहाँ के इतिहास में यहाँ के राजे महाराजाओ द्वारा राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व बलिदान देने की अनेको कहानिया है।  लेकिन क्या Rajasthan में क्या सिर्फ राजे रजवाड़ो की ही कहानियाँ है ? क्या Rajasthan में व्पारियो का इतिहास में कोई नाम नहीं है ? तो चलये जानते है Rajasthan के व्यापारी वर्ग के शिरोमणि जिन्होंने अपने राष्ट्र के नाम अपनी पूरी सम्पति दान कर दी और उनसे जुडी कुछ ऐसी बाते जो आपको बहुत कम लोग बता पाएगे।
                                                                          आज इस पोस्ट में हम जानेगे Rajasthan के कर्ण कहे जाने वाले भामाशाह के बारे में और जानेगे भामाशाह से जुडी कुछ महत्व की बाटे जो बहुत कम लोग जानते है। जानने के लिए पुरे पोस्ट को जरूर पढ़े। 

भामाशाह का जन्म और जीवनी 

Rajasthan के दानवीर भामाशाह  का जन्म सन 1542 में एक जैन परिवार में हुआ था और मेवाड़ के राणा सांग ने भामाशाह के पिता भारमल कावड़िए को रणथम्बोर किले का क़िलेदार बनाया था और राणा उदयसिंह ने इनके पिता को अपना प्रधान मंत्री बनाया था। भामाशाह उदयसिंह के पुत्र मेवाड़ शिरोमणि महाराणा प्रताप के बचपन से अच्छे मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र थे।
                                                                            सन 1572 में जब राणा उदयसिंह की मृत्यु हो गई और महाराणा प्रताप मेवाड़ के राजसिंहासन पर बैठे। महाराणा प्रताप के समकालिन दिल्ली के शहंशाह अकबर था। अकबर में Rajasthan के लगभग सभी राजा महाराजा को अपने अधीन कर लिया था परन्तु मात्र मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। अकबर ने महाराणा प्रताप को मानाने के लिए तीन संधि प्रस्ताव भेजे लेकिन महाराणा प्रताप ने तीनो प्रस्तावों को ठुकरा दिया अतः 18 जून 1576 में हल्दीघाटी के मैदान में मानसिंह के नतृत्व में अकबर की सेना और महाराणा प्रताप की सना के बेच युद्ध हुआ।यह युद्ध अनिर्णायक रहा क्योकि इसमें न महाराणा अकबर की सेना को हरा पाए और न ही अकबर महाराणा प्रताप को पकड़ पाया। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की आर्थिक स्थति बहुत दयनीय हो गई थी और इस कारण वे अपने सेना का क्या अपने परिवार का भी पालन करने में असमर्थ हो चुके थे। इस विकट परिस्थति में भी महाराणा प्रताप ने अकबर के अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया  और संघर्ष करने का निर्णय लिया। लेकिन सेना संगठित करने के लिए धन की आवश्यकता थी परन्तु धन वे लाते कहा से। महाराणा की इस विकट परिस्थति में उनके बचपन के मित्र भामाशाह ने उनको अपनी सम्पति दान कर दी और इस सम्पति के बलबूते महाराणा प्रताप ने अकबर से अपना संघर्ष जारी रखा। भामाशाह  दान दिया उसके कारण वे इतिहास में अमर हो गए और आज भामाशाह नाम एक दानी व्यक्ति का पर्याय बन गया है। भामाशाह की मृत्यु सन 1600 में हुए थी।

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भामाशाह से जुड़े पांच तथ्य जो आपको जानने जरूरी है। 

  • भामाशाह हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा के एक विश्वस्त सेनापति थे। ये न सिर्फ एक कुशल व्यापारी थी अपितु ये एक  सेनानायक , वीर, साहसी, नितिज्ञ, कुशल प्रबंधक, स्वामिभक्त, उदारमना, योग्य प्रशासक, देशभक्त भी थे। 
  • भामाशाह ने महाराणा प्रताप को जो दान दिया उसका पूरा हिसाब कुछ इस प्रकार था की उसमे कुल 20000 सोने के सिक्के थे और 2500000 चांदी के सिक्के थे। 
  • सन 1578 में भामाशाह ने और उनके भाई ताराचंद ने मेवाड़ की बिखरी सैन्य शक्ति को एकत्रित कर   मुग़ल सूबे मालवा पर हमला किया और इस हमले में मालवा में इन्होने खूब लूट मचाई और वहाँ से काफी धन लूट कर मेवाड़ के महाराणा को दे दिया। 
  • भामाशाह को महाराणा प्रताप ने भामाशाह को राजकीय खजाने का कोषध्यक्ष बनाया और ताराचंद को गोडवाड़ का ठाकुर बनाया। 
  • भामाशाह के नाम पे Rajasthan सरकार ने 15 अगस्त 2014 को नई योजना का नाम "भामाशाह योजना " रखा गया। सन 2000 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट पे भामाशाह का नाम पे निकाला था। 
आपको यह पोस्ट किसी लगी कमेंट करके बताए। 

Wednesday, 31 October 2018

The untold story of Rajasthan Hero Kesari Singh Barahath in hindi

Indian History में Rajasthan का नाम न लिया जाए तो ये शायद नाइंसाफी होगी क्योंकि राजस्थान का इतिहास है ही ऐसा। जब भी भारत पर हमले हुए तब rajasthaniyo ने हँसते हँसते अपने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण दाव पर लगा दिए। कुछ लोगो ये कहते है की Rajasthan  के लोगो ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका निभाई ? तो चलये आज उन लोगो को Rajasthan  के एक ऐसे वीर की कहानी बताते है जिसने न सिर्फ अपने आप को बल्कि अपने पुरे परिवार को देश के नाम समर्पित कर दिया। इस वीर की कलम में इतनी ताकत थी की उसने महाराणा प्रताप की सन्तानो को उनका भुला स्वाभिमान याद दिलवा दिया और महाराणा प्रताप की पाग को विदेशियों के सामने झुकने से बचा लिया। तो आज इस पोस्ट में जानते है क्रान्तिकारी वीर केसरी सिंह बारहट के बारे में।
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प्रारंभिक जीवन 

Rajasthan के इस वीर का जन्म ठाकुर कृष्ण सिंह बारहठ के पुत्र के रूप 21 नवंबर 1872 में Rajasthan के तत्कालीन शाहपुरा रियासत के देवपुरा गांव में हुआ था। केसरी सिंह जी के जन्म के एक महीने बाद उनकी माता का देहांत हो गया इसलिए इनका लालन पालन इनकी दादी माँ ने किया। 

शिक्षा 

इनकी शिक्षा उदयपुर में हुई। इनको बांग्ला, मराठी , गुजराती आदि भाषा के साथ  साथ  इनको इतिहास , मनोविज्ञान , दर्शन ,ज्योतिषशास्त्र और खगोलशास्त्र का ज्ञान था। डिंगल पिंगल भाषा का ज्ञान तो इनको चारण कुल में जन्म लेने के कारण विरासत में मिला हुआ था। बनारस के पंडित गोपीनाथ  ने इनको संस्कृत का ज्ञान दिया और इनके स्वाध्याय के लिए इनके पिता का पुस्तकालय "कृष्ण वाणी विलास " उपलब्ध था। 

केसरी सिंह बारहठ का जीवन 

                                                     
freedom fighter
ठाकुर केसरी सिंह बारहठ 
सन 1903 में लार्ड कर्जन ने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के अवसर पर दिल्ली में भारतीय राजाओ का दरबार आयोजित किया जिसमे उदयपुर के महाराणा फतेह सिंह को भी बुलाया गया। महाराणा फतेह सिंह उस दरबार में शामिल होने के लिए जा रहे थे तो दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनको केसरी सिंह बारहठ के द्वारा लिखित 13 सोरठो का एक पत्र मिला। इस पत्र में केसरी सिंह ने महाराणा के पुरखों का गुणगान करते हुए फतेह सिंह को धिक्कारा था।  इस पत्र को पढ़कर महाराणा का सोया हुआ गौरव जाग गया और उन्होंने दिल्ली में होते हुए भी  दरबार में न जाने का निर्णय लिया।  इन 13 सोरठों को "चेतावनी रा चुगटिया" नाम से जाना जाता है।
                                                       केसरी सिंह बारहठ ने सन 1910 में गोपाल सिंह खरवा के साथ मिलकर "वीर भारत सभा" नामक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। साधु प्यारेलाल हत्याकांड में इन्हे सन 1914 में  जेल में दाल दिया गया  और 20 वर्ष का कारावास की सजा सुनाई गई। केसरी सिंह को बिहार के हज़ारी बाग जेल में रखा गया। जेल में केसरी सिंह को अपने पुत्र प्रताप सिंह बारहठ की शहादत की ख़बर मिली तब उन्होंने अपने बेटे के बारे में कहा "भारत माता का पुत्र उसकी मुक्ति के लिए शहीद हो गया उसकी मुझे बहुत प्रसंता है "
                                            जेल से छूटने के बाद सन 1922 में वे सेठ जमनालाल बजाज के निमंत्रण पर वर्धा चले गए और उनकी मुलाकात विजय सिंह पथिक से हुई और इनकी मृत्यु सन 1941 में हुई।
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केसरी सिंह के पुत्र प्रताप सिंह का बलिदान 

केसरी सिंह बारहठ को जब यह खबर मिले की रास बिहारी बोस ने सशस्त्र क्रांति शुरू की है तब उन्होंने अपने बेटे प्रताप सिंह , अपने भाई जोरावर सिंह और अपने जमाता ईश्वर दान आसिया को उनके पास भेजा। सन 1917 में प्रताप सिंह बारहठ को "बनारस षडयंत्र अभियोग" में पकड़ लिया गया। न्हें 5 वर्ष के लिए बरेली की केंद्रीय जेल में बंद किया गया। जेल में उन्हें भयानक यातनाएँ तथा प्रलोभन आदि दिये गए। उनसे कहा गया कि यदि वे पूरे कार्य का भेद बता दें तो उनके पिता को जेल से मुक्त कर देंगे, उनकी जागीर लौटा दी जायेगी, उसके चाचा पर से वारंट हटा लिया जायेगा, लेकिन वीर प्रताप ने अपने क्रान्तिकारी साथियों के बारे में कुछ नहीं बताया। उन्होंने मरना स्वीकार कर लिया, पर राष्ट्र के साथ गद्दारी नहीं की। जब उन्हें उनकी माँ की दशा के बारे में बताया गया तो वीर प्रताप ने कहा कि- "मेरी माँ रोती है तो रोने दो, मैं अपनी माँ को हंसाने के लिए हज़ारों माताओं को नहीं रुलाना चाहता।" अंत में अंग्रेज़ सरकार की अमानुषिक यातनाओं से 27 मई1918 को मात्र 22 वर्ष की आयु में प्रताप सिंह शहीद हो गए।  

केसरी सिंह के भाई जोरावर सिंह का बलिदान 

जोरावर सिंह ने रास बिहारी घोष के साथ मिलकर दिल्ली के 'चांदनी चौक' में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय पर बम फेंका, जिसमें हार्डिंग घायल हो गया तथा मृत्यु से बाल-बाल बचा। इस पर महात्मा गाँधी ने उसे बधाई का तार भेजा था। इस हमले में वायसराय तो बच गया, पर उसका ए.डी.सी. मारा गया। जोरावर सिंह पर अंग्रेज़ सरकार ने इनाम घोषित कर दिया, किंतु वे पकड़ में नहीं आये। वे एक संन्यासी की तरह फ़रार रहते हुए ग्राम-ग्राम जाकर धर्म और देशभक्ति का जनजागरण करते रहे। अंग्रेज़ों से छिपने के दौरान ही भारी निमोनिया और इलाज न करा पाने के कारण 1939 में वे कोटा में शहीद हो गए।

 केसरी सिंह द्वारा शिक्षा प्रसार 

केसरी सिंह बारहठ ने समाज विषेशकर क्षत्रिय समाज को अशिक्षा  के अभिशाप से मुक्त करने के लिए अनेक  योजना बनाई। उस समय अंग्रेज़ो द्वारा स्थापित "मेयो कॉलेज अजमेर" में पढ़कर सभी राजे -राजकुमार अपनी जनता को और अपने क्षात्र धर्म को भूलकर अपनी जनता को से दूर हो गए थे। इसलिए इन्होने अजमेर में "क्षत्रिय कॉलेज" की स्थापना की जिसमे राष्ट्र भावना  शिक्षा दी जाती थी। इसके साथ ही इन्होने राजस्थान के होनहार छात्रों को सस्ती तकनीक शिक्षा दिलाने के लिए उन्हें जापान भेजने की योजना बनाई। इन्होने चारण जाति और क्षत्रिय जाति को शिक्षित कर उन्हें राष्ट्र स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने को प्रेरित करते थे। 

केसरी सिंह द्वारा लिखित साहित्य 

केसरी सिंह बारहठ ने " रूठी रानी", "प्रताप चरित्र" , "राजसिंह चरित्र" ,"दुर्गादास चरित्र" आदि इनके द्वारा लिखित कुछ ग्रंथ है।  

                                          
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Wednesday, 24 October 2018

Most famous Freedom fighter of India in hindi

भारत के freedom fighters का Indian history में एक अलग ही महत्व है। इन लोगो ने Indian history की उस मान्यता को ख़त्म कर दिया जो यह कहती थी की भारतीय जनता अपने ऊपर होने वाले शासको के अत्याचारों का विरोध नहीं कर सकती। ये freedom fighter न सिर्फ स्वतंत्रता पूर्व भारतीयों के आदर्श थे बल्कि आज भी भारत के हज़ारों युवाओं के आदर्श है। आज मैं आपको Indian history के ऐसे ही कुछ freedom fighters ke बारे में बताने वाला हूँ जो अपने देश के लिए अपना जीवन दाव पे लगाकर Indian History में अपना नाम लिखवा गए।

  • मंगल पांडे 
मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 में हुआ। मंगल पांडे ने 22 साल की उम्र में British Indian Army को join किया। अंग्रेज़ों  ने भारतीय सेना में Enfield P-53 राइफल लाया। इस राइफल में कारतूस भरने के लिए  राइफल को मुँह से खोलना पड़ता था और ये खबर फैलाई गए की इस कारतूस में गाय और सुवर की चरबी थी। अतः भारतीय सैनिकों का ऐसा करना धर्म के विरुद्ध था। 9 फरवरी 1857 में ये राइफल सेना में बाटी गई तब मंगल पांडे ने इसका इस्तेमाल करने से माना कर दिया तब अंग्रेज़ों ने उनका court martial कर दिया। 29 मई 1857 को जब अँग्रेज़ अधिकारी मेजर ह्यूसन उनकी बन्दुक छीन ने लगा तब उन्होंने उस पर हमला कर दिया और उसे मार दिया इसके साथ ही मंगल पांडे ने एक और अँग्रेज़ अधिकारी को भी मार दिया और फिर अपने आपको गोली मारने  लगे परन्तु उन्हें पकड़ लिया गया और 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फाँसी दे दी गई। 
                          मंगल पांडे की मृत्यु के एक महीने बाद 10 मई 1857 को मेरठ छावनी के भारतीय सेनिको ने विद्रोह कर दिया और यह विद्रोह धीरे धीरे पुरे उत्तर भारत और देश के अन्य हिस्सों में फैल गया और एक क्रांति में बदल गया। 
                      मंगल पांडे Indian history के पहले क्रांतिकारी  थे और इनके द्वारा जिस क्रांति का बीज बोया गया वो अगले 100 साल तक चलता रहा। 

  • रानी लक्ष्मीबाई  

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rani Lakshmibai

    रानी लक्ष्मीबाई जो आज झाँसी की रानी नाम से प्रसिद्ध है का जन्म 19 नवंबर 1828 में वाराणसी में हुआ था। इनके पिता श्री मोरपंत ताम्बे बिठूर के पेशवा बाजीराव के वहाँ सेवा करते थे। रानी लक्ष्मीबाई को बचपन से ही घुड़सवारी , शस्त्रसंचालन और आत्मरक्षा के सभी गुर सिखाए गए थे। सन 1842 में लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवलकर से कर दिया गया, कुछ समय पश्चात उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम दामोदर राव रखा गया परन्तु मात्रा चार महीने बाद उस पुत्र की मृत्यु हो गई। दामोदर राव की मृत्यु के कुछ समय बाद रानी लक्ष्मीबाई और उनके पति ने आनंद राव नाम के लड़के को अपने रिश्तेदार से गोद लिया। सन 1853 में राजा गंगाधर की मृत्यु हो गई तब लॉर्ड डलहौज़ी ने 'व्यपगत के सिद्धांत ' के तहत झाँसी को अपने कब्ज़े में लेने का प्रयास किया और आनंद राव को राजा का उत्तराधिकारी नहीं माना। सन 1854 में ब्रिटिश सरकार ने एक गज़ट जारी करके झाँसी को अपने अधीन करने की कोशिश करी परन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी देने से माना कर दिया। सन 1857 में जब पुरे देश में अंग्रेज़ों  के ख़िलाफ़ बगावत हो गयी तब रानी ने झाँसी में बगावत का मोर्चा संभाल। जनवरी 1858 में सर हुज ने झाँसी पर हमला किया और किले पर अपना अधिकार कर लिया, रानी अपने दत्तक पुत्र के साथ वहाँ से निकल गए और कल्पी जाकर तात्या तोपे से मिली। 17 जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर के निकट अंग्रेज़ों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गई।


    • ठाकुर कुशाल सिंह 
                                              
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    ठाकुर कुशाल सिंह 
    सन 1857 की क्रांति की राजस्थान में शुरुआत नसीराबाद छावनी से हुई और मारवाड़ रियासत की छोटी सी जागीर के ठाकुर कुशाल सिंह ने इस क्रांति  का नेतृत्व किया। ठाकुर कुशाल सिंह अंग्रेज़ो से नफरत करते थे अतः उन्होंने बागी सेनिको का समर्थन किया। जब अंग्रेज़ों को इस बता का पता चला तब उन्होंने मारवाड़ के राजा तख्त सिंह से सहायता मांगी और 8 सितम्बर 1857 को राजा तख्त सिंह ने ठाकुर के खिलाफ सेना भेजी परन्तु इस सेना को ठाकुर कुशाल सिंह ने हरा दिया। तख्त सिंह ने इस सूचना का अजमेर पहुंचा दिया तब 18 सितम्बर 1857 को अजमेर के गवर्नर जनरल एजेंट सर पैटिक  लारेन्स और मारवाड़ के पोलिटिकल एजेंट एन मॉक मेसन ने आऊवा पर हमला कर दिया तब कुशाल सिंह ने लारेन्स को हरा दिया और मॉक मेसन को पकड़कर उसका गला काटकर अपने क़िले पर लटका दिया। इस हरा के बाद अंग्रेज़ों ने काफी बड़ी सेना लेकर आऊवा पर हमला कर दिया और ठाकुर कुशाल सिंह को वहाँ से भागना पड़ा और सन 1864 में इनकी मृत्यु हो गई
    Read History of Nadol(pali Rajsthan)  


    • अमरचन्द बांठिया 
                                           
    freedom fighter from rajasthan
    अमरचन्द बांठिया 
                                   
    अमरचन्द बांठिया का जन्म सन 1791 में बीकानेर में हुआ। वे अपने पिता के साथ व्यापार करने के लिए ग्वालियर चले गए। इनको नगर सेठ की उपाधि देते हुए ग्वालियर के राजपरिवार ने इन्हे राज कोष का प्रभारी बनाया। सन 1857 में जब रानी लक्ष्मीबाई और तात्या तोपे को धन की आवश्यकता पड़ी तब अमरचन्द ने उनको ग्वालियर का पूरा राज कोष और अपनी निजी सम्पति दान कर दी इसलिए इन्हे 1857 क्रांति का भामाशाह कहा जाता है। जब यह बात अंग्रेज़ों को इस बात का पता चला तब 22 जून 1857 को अंग्रेज़ों ने अमरचन्द बांठिया को पेड़ से लटकाकर फाँसी लगा दी।  

    • सागरमल गोपा 
                                     
    freedom fighter
    सागरमल गोपा 
                   
    सागरमल गोपा का जन्म 3 नवंबर 1900 में जैसलमेर में हुआ था। इन्होंने जैसलमेर में राजनैतिक चेतना के साथ साथ तत्कालीन राजा जवाहर सिंह के अत्याचारों का कड़ा विरोध किया इसलिए इनका प्रवेश हैदराबाद और जैसलमेर में प्रतिबन्धित था। लेकिन इसकी परवाह किये बगैर वे अपनी क्रन्तिकारी गतिविधियों को जारी रखते है और समाज में राजनैतिक चेतना पैदा करते है। 25 मई 1941 में इन्हे राजद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया जाता है और 4 अप्रैल 1946 को जेल में इनकी हत्या कर दी जाती है।  


    • बिरसा मुंडा 
                                           
    freedom fighter of India
    बिरसा मुंडा 
    बिरसा मुंडा का जन्म 1875 में झारखंड में हुआ था। बिरसा मुंडा, मुंडा जाति के आदिवासी थे। बिरसा मुंडा के माता पिता ने ईसाई धर्म अपना लिया परन्तु बिरसा मुंडा ने ऐसा नहीं किया और उन्होंने अपने आदिवासी समाज को अन्धविश्वास, मादक पदार्थों से दूर रहने के लिए कहा और स्वधर्म न छोड़ने को कहा। इन्होने आदिवासीयो को अंग्रेज़ों  के खिलाफ एक किया और 24 दिसंबर 1899 में बिरसा मुंडा ने अंग्रेज़ों के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन में आदिवासियों ने कई पुलिस थानों में आग लगा दी और वे सेना से भी लड़ने लगे परन्तु उसमे वे हार गए और 9 जून 1900 में बिरसा मुंडा की मृत्यु राँची जेल में हो गई। 

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    Tuesday, 16 October 2018

    great women of Indian History In hindi

    आज इस पोस्ट मै आपको  ऐसी कुछ Great women  के बारे मे बताने जा रहा हुँ जो न सिर्फ Indian History मे बल्की पुरे विश्व के History  मे अपनी अनोखी छाप छोडती है।इन women  ने शिक्षा से लेकर राजनीति तक और भक्ति से लेकर शक्ति तक के क्षेत्रो मे जिस प्रकार अपने लौहा मनवाया उससे इन्होने ये साबित कर दिया की भारतीय स्त्रीयाँ अबला नही सबला है। तो चलिए जानते great women of Indian History के बारे में
    • गार्गी
    गार्गी वैदिक काल की एक विदुषी महिला थी।इनके पिता महर्षि वाचकनु थेइसलिए इनका नाम वाचकन्वी रखा गया और महर्षि गर्ग के कुल मे जन्म लेने के कारण इन्हे गार्गी नाम से जाना जाता है।
                गार्गी एक महान प्राकृतिक दार्शनिक, वेदो की व्याख्याता और ब्रह्म विद्या की ज्ञाता थी। इन्होने शास्त्रार्थ मे कई विद्वानो को हराया था। एक बार राजा जनक द्वारा आयोजित यज्ञ मे गार्गी ने महर्षि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थ मे गार्गी के द्वारा पुछे गए प्रशनो के उत्तर देने के लिए महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्रह्म दर्शन का प्रतिपादन करना पड गया।
    • मैत्रयी
    मैत्रेयी वैदिक काल की विदुषी और ब्रह्मवादनी स्त्री थी।ये मित्र ऋषि की कन्या थी। राजा जनक ने दरबार मे शास्त्रार्थ का आयोजन किया और इस आयोजन मे मैत्रयी ने कई विद्वानो को शास्त्रार्थ मे हरा दिया और अन्त मे इनका सामना महर्षि याज्ञवल्क्य से हुआ। इस शास्त्रार्थ मे याज्ञवल्क्य की हार हुई।महर्षि मैत्रयी को अपना गुरू बनाना चाहते थे परंतु मैत्रेयी ने उनसे विवाह कर लिया। मैत्रेयी ने उनसे विवाह इसलैए किया क्योकी उन्हे पुरी सभा याज्ञवल्क्य समान विद्वान नही मिला। कुछ सालो बाद महर्षि याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ आश्रम त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम मे जाने का निर्णय लिया। तब उन्होने अपनी दोनो पत्नियो कात्यानी और मैत्रेयी मे सम्पति बाटना चाहते थे परंतु मैत्रयी ने सम्पति की जगह उशके साथ वानप्रस्थ जाने का निर्णय लिया।
    • महाप्रजापति गौतमी
    महाप्रजापति गौतमी कोलिय राज्य की राजकुमारी थी और इनका विवाह कपिलवस्तु के शाक्य राजा शुद्धोधन से हुआ था। ये गोतम बुद्ध की मौसी और दत्तक माता थी।
                पारम्भ मे बोद्ध संघ मे स्त्रीयो का प्रवेश वर्जित था। बोद्ध संघ मे स्त्रीयो को प्रवेश करवाने के  लिए महाप्रजापति ने काफी संघर्ष किया। इन्होने सर्वप्रथम कपिलवस्तु मे बुद्ध से संघ मे स्त्री प्रवेश के लिए अनुरोध किया परंतु बुद्ध ने उसे अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार महाप्रजापति ने कुल तीन असफल प्रयास किए। अंत मे वैशाली मे बुद्ध ने संघ के द्वार महिलाओ के लिए खोल दिए और महाप्रजापति गोतमी पहली महिला बनी जिसने बोद्ध संघ मे प्रवेश लिया।
    • रानी नागनिका
    रानी नागनिका सातवाहन वंश के राजा शातकर्णी प्रथम की पत्नी थी। यह भागवत धर्म की अनुयायी थी और इन्होने नानाघाट के अभिलेख लिखवाया थे। शातकर्णी की मृत्यु के बाद इन्होने अपने अल्पवयस्क पुत्रो की संरक्षिका के तोर पर साम्राज्य पर राज किया।
    • रजिया सुल्तान (1236-39)
    रजिया सुल्तान गुलाम वंश के दुसरे सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी और उनकी उत्तराधीकारी थी। रजिया सुल्तान दरबार मे बुर्का डाले बिना आती,शिकार खेलती और सेना का नेतृत्व भी करती। वजीर निजाम-उल-मुल्क जुनैदि ने इनके सत्तारोहण का विरोध किया लेकिन वजीर को सुल्तान ने हरा दिया और वो भाग गया। इन्होने लाहोर के विद्रोह का दमन किया और सरहिंद जाते समय एक आंतरिक बगावत के कारण इनको कैद कर लिया गया परंतु कैद मे अल्तुनीया ने इनसे निकाह कर लिया। इन दोनो ने मिलकर दिल्ली को पुन जितने का प्रयास किया परंतु असफल रहे। अंत मे डाकुओ ने रजिया सुल्तान को मार दिया।इनके बारे मे कवि मिन्हाज सिराज कहता है कि"वह विवेकमयी, लोकोपकारी, अपने राज्य की हितैषी, न्याय करने वाली, प्रजापालक और महान यौद्धा थी।
    • मीराबाई
    मीराबाई का जन्म 1498ई. मे मारवाड रियासत के मेडता जागीर के रतन सिंह की पुत्री के रूप मे हुआ। यह बचपन से ही कृष्ण भक्ति मे लगी रहती थी। इनका विवाह मेवाड के महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से कर दिया गया परंतु विवाह के कुछ समय पश्चात भोजराज की मृत्यु हो गई।राजपरिवार के सदस्य चाहते थे की वे सती हो जाए परंतु मीराबाई ने स्पष्ट मना कर दिया और कहाँ की अब वे कृष्ण भक्ति करेगी।उनके पति के छोटे भाई राणा विक्रमादित्य को इनकी कृष्ण भक्ति सेऐतराज था इसलिए उसने कई बार मीराबाई को मारने का प्रयास किया। इन सब यातनाओ से तंग मीराबाई मेवाड छोडकर मेडता चली गई और मेडता से वो वृन्दावन गई और अपने अंत समय मे वे द्वारक रही।
                   मीराबाई एक सच्ची विद्रोही थी उन्होने तत्कालीन समाज मे व्यापत पर्दा प्रथा और सती प्रथा का त्याग करके समाज को बता दिया की स्त्री का सर्वेसर्वा उसका पति नही होता और मृत्यु के पश्चात भी एक स्त्री अपना जीवन जीने की अधीकारी है।
    • पन्नाधाय
    पन्नाधाय मेवाड के महाराणा सांगा की पत्नी रानी कर्मावती की दासी थी। सन् 1535 मे गुजरात के बहादुरशाह ने मेवाड पर आक्रमण किया,तब रानी कर्मावती ने पन्नाधाय को अपने सबसे छोटे पुत्र उदयसिंह को सोपकर जौहर कर लेती है।इस युद्ध के कुछ समय बाद मेवाड के सामंत एक होकर पुनः चितौड को जीत लेते है और विक्रमादित्य को राणा बना देते है। विक्रमादित्य एक अयोग्य शासक था इस कारण से दासीपुत्र बनवीर ने षडयंत्र करके उसकी हत्या कर दी और उदयसिंह को मारने के लिए वो नंगी तलवार लेकर उसके कक्ष की तरफ जाने लगा।यह बात पन्नाधाय को पता चल जाती है तब वे उदयसिंह के स्थान पर अपने पुत्र चन्दन को सुला देती है और उदयसिंह को महल के बाहर भेज देती है। जब बनवीर वहा पहुचा तो उसने सोते हुए चन्दन को उदयसिह समझ कर उसकी हत्या पन्नाधाय के सामने कर देता है।
                      पन्नाधाय का यह पुत्र बलिदान विश्व इतिहास मे शायद इकलोता उदहारण है और इस बलिदान के कारण ही भारत मे महाराणा प्रताप जैसा वीर पुत्र पैदा हुआ।


    • रानी दुर्गावती 
                     
     Rani durgawati
                  
    रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 में कालिंजर के चंदेल राजा कीरत राय की बेटी के रूप में हुआ। बचपन से हे रानी दुर्गावती वीर और साहसी थी। रानी दुर्गावती का विवाह गोंड वंश के राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह से हुआ। सन 1545 में रानी दुर्गावती का एक बेटा हुआ जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। दुर्भाग्यवस दलपत शाह की मृत्यु 1550 में हो गई और वीर नारायण उस समय बहुत छोटा था अतः रानी उसकी संरक्षिका के तोर पर राज करने लगी। 
                                         रानी दुर्गावती के राज्य पर मालवा के सुल्तान बाजबहादुर ने कई बार हमला किया परन्तु वो हर बार हार गया इस कारण रानी के ख्याति बहुत बढ़ गये। सन 1562 में मुग़ल बादशाह अकबर ने मालवा पर आक्रमण कर उसे जीत लिया तब रानी दुर्गावती के राज्य की सीमा तक अकबर का साम्राज्य फेल गया अतः इन दोनों राज्यों के मध्य युद्ध होना तय था।  
                                                                                    अकबर ने आसफ खाँ के नेतृत्व में रानी के खिलाफ युद्ध के लिए सेना भेजी परन्तु इस युद्ध में आसफ खाँ की पराजय हुए। इसके कुछ वर्षो बाद अकबर ने पुनः आसफ खाँ के नेतृत्व में सेना भेजी और 24 जून 1564 को रानी और आसफ खाँ की सेना के मध्य युद्ध हुआ और इस युद्ध में रानी दुर्गावती ने पुरुष वेश धारण करके युद्ध किया और जब वे बुरी तरह से घायल हो गयी तब उन्होंने पकड़े जाने से अच्छा मृत्यु का वरन करना उचित समझा और उन्होंने अपने सिने में कटार मर दिया। 
                                                                 रानी दुर्गावती ने स्वतंत्र जीवन जिया और अपनी स्वतंत्रता के रक्षा में अपने प्राण भी दे दिए। 

    • हाड़ी रानी 

    हाड़ी रानी का जन्म बूंदी (राजस्थान ) के हाडा राजपूत राजवंश में हुआ था। इनका विवाह मेवाड़ के सलूम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुंडावत  के साथ हुआ। इनके विवाह के कुछ समय पस्चात मेवाड़ के महाराणा राज सिंह ने रावत चुंडावत को औरंगज़ेब की सेना से युद्ध करने के लिए बुला दिया। तब रावत रतन सिंह युद्ध  करने के लिए रवाना हुए तभी वे अचानक रुके और अपने विश्वस्त सेवक को भेजकर रानी से उनकी कोई निशानी देने को कहा। यह बात सुनकर हाड़ी रानी ने अपने पति को अपने मोहपाश में बंधा पाया और उन्हें लगा की शायद इस मोहपाश के कारण उनके पति युद्ध में वीरता से न लड़ पाए। अतः उन्होंने अपनी दासी से तलवार मगवाई और अपना  सर  काटकर रावत जी को निशानी रूप में प्रदान  दिया। अपनी रानी के इस अनोखी निशानी को देखकर रावत जी  कर्तव्य का बोध हुआ और उन्होंने रानी  के सिर को गले में बांधकर युद्ध में मुग़लो  सिरों को काटा और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए। इस युद्ध में महाराणा की विजय हुई।
                                                               
    Hadi rani cuts her head for giving momentum to Rawat Chudawat
                                                               हाड़ी रानी की कहानी उन सब लोगो के मुँह पे ताला जड़ देती है जो यह कहते है की स्त्री पुरुष के कर्तव्यपथ में बाधा है। इन्होने संसार को बता दिया स्त्री नहीं पुरुष का मोह उसके कर्तव्यपथ में बाधा है।

    •  अमृता देवी बिश्नोई 
                                             
    amrita devi saving the tree from a royal soldier
     
    अमृता देवी कोई रानी या महारानी नहीं थे ये एक आम महिला थी जिन्होंने अपने प्रकृति प्रेम के कारण इतिहास में नाम लिखवा दिया। सन 1730 में मारवाड़ राज्य (वर्तमान जोधपुर और उसके आसपास का क्षेत्र ) के महाराजा अभय सिंह ने राजकीय उत्सव के लिए खेजड़ी की लकड़ी लाने का आदेश अपने सेनिको को दिया। तब सैनिको ने खेजड़ली गाँव से खेजड़ी के पेड़ काटने की सोची और वे खेजड़ली पहुंचे और पेड़ कटाने लगे। यह देखकर गाँव की बिश्नोई महिला अमृता देवी ने उन सेनिको को रोकने का प्रयास किया परन्तु राजाज्ञा के मद में चूर सेनिको ने अमृता देवी की कोई बात नहीं सुनी तब अमृता देवी ने अपनी तीन बेटियों(असू, रतनी और भागु ) के साथ मिलकर पेड़ो से चिपक गए और अमृता देवी बोली के "सिर साठे रुख रहे तो भी सस्ता जान "(अर्थ -अगर सिर कटाकर भी एक पेड़ बचता है तो इसे भी सस्ता मानना चाहिए। यह सब देखकर भी उन शक्ति के मद में चूर सेनिको ने उनके सिरों को पेड़ समेत काट दिया। इस बता को जब लोगो ने सुना तब असंख्य बिश्नोई लोगो ने भी पेड़ो के रक्षा के लिए अपने प्राणो की आहुति दे दी। 



    • रानी लक्ष्मीबाई 
                                                  
    rani Lakshmibai

    रानी लक्ष्मीबाई जो आज झाँसी की रानी नाम से प्रसिद्ध है का जन्म 19 नवंबर 1828 में वाराणसी में हुआ था। इनके पिता श्री मोरपंत ताम्बे बिठूर के पेशवा बाजीराव के वहाँ सेवा करते थे। रानी लक्ष्मीबाई को बचपन से ही घुड़सवारी , शास्त्रसंचालन और आत्मरक्षा के सभी गुर सिखाए गए थे। सन 1842 में लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवलकर से कर दिया गया, कुछ समय पश्चात उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम दामोदर राव रखा गया परन्तु मात्रा चार महीने बाद उस पुत्र की मृत्यु हो गई। दामोदर राव की मृत्यु के कुछ समय बाद रानी लक्ष्मीबाई और उनके पति ने आनंद राव नाम के लड़के को अपने रिश्तेदार से गोद लिया। सन 1853 में राजा गंगाधर की मृत्यु हो गई तब लॉर्ड डलहौज़ी ने 'व्यपगत के सिद्धांत ' के तहत झाँसी को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया और आनंद राव को राजा का उत्तराधिकारी नहीं माना। सन 1854 में ब्रिटिश सरकार ने एक गज़ट जारी करके झाँसी को अपने अधीन करने की कोशिश करी परन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी देने से माना कर दिया। सन 1857 में जब पुरे देश में अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ बगावत हो गयी तब रानी ने झाँसी में बगावत का मोर्चा संभाल। जनवरी 1858 में सर हुज ने झाँसी पर हमला किया और किले पर अपना अधिकार कर लिया, रानी अपने दत्तक पुत्र के साथ वहाँ से निकल गए और कल्पी जाकर तात्या तोपे से मिली। 17 जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर के निकट अंग्रेज़ो से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गई।
    Read - झाँसी की रानी कविता 
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    Friday, 12 October 2018

    The Indian History Of Destruction and Reconstruction- The Somnath

    Indian history की कुछ कहानिया ऐसी होती है जो हम बहुत कुछ सिखाती है। आज मेरी इस पोस्ट में मै आपको Indian History की एक ऐसी घटना के बारे में बताऊंगा, जो विध्वंश और पुनःनिर्माण की कहानी है।  यह कहानी है भारत के 1000 साल के संघर्ष की, जिसमे संघर्ष हुआ राष्ट्रभक्तो और बाहरी आक्रमणकारियो की बीच में। यह कहानी हमें बताती है किस प्रकार किसकी नफ़रत हजारों निर्दोष लोगो की जान ले लेती है। इस कहानी में एक तरफ तो नफ़रत के कारण विध्वंश होता है और दुसरी तरफ भक्ति के कारण उस विध्वंश का पुनःनिर्माण।
                         यह कहानी है भारत के प्रथम ज्योतर्लिंग सोमनाथ की। सोमनाथ मंदिर भारत के गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के वेरावल नगरपालिका से 6 km दूर स्थित है। सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतर्लिंग में से एक है इसलिए यहाँ हर साल हजारो भक्त आते है। सोमनाथ मंदिर न सिर्फ धार्मिक रूप से अपितु ऐतिहासिक रूप से भी बहुत महत्व पूर्ण है तो चलये जानते है सोमनाथ मंदिर का इतिहास।

    1. सोमनाथ मंदिर का इतिहास 
    • पौराणिक कथा 
    पौराणिक कथाओ के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा से किया था। चन्द्रमा उन 27 में से रोहणी से ज्यादा प्रेम करते थे  इस कारण से वे बाकि सभी रानियों के साथ सौतेला व्यवहार करते थे। यह बात जब चन्द्रमा की बाकि 26 रानियों ने जब प्रजापति दक्ष को बताई तब प्रजापति ने चन्द्रमा को समझया और वहा से चले गए।  लेकिन इतना समझाने के बाद भी जब चन्द्रमा नहीं माने तो प्रजापति दक्ष ने चन्द्रमा को यह श्राप दिया की वे क्षयरोग से ग्रसित हो जाए और जब प्रजापति ने उन्हें यह श्राप दिया तब पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब देवताओ ने ब्रह्मा जी से इसका उपाय पूछा तब ब्रह्मा  जी ने कहा की "इस श्राप से मुक्ति के लिए चन्द्रमा को प्रभास क्षेत्र(सौराष्ट्र ) में जाकर भगवान शिव के पूजा करो" इतना सुनकर चन्द्रमा प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर कुल 6 महीने तक भगवान शिव की पूजा करते रहे। तब भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें वर मांगने को कहा तब चन्द्रंमा ने शिवजी से उनका रोग सही करने को कहा तब शिवजी ने उन्हें वरदान दिया की वे 15 दिन क्षीण रहेंगे और 15 दिन रूपवान। यह वर पाकर चन्द्रमा खुश हुए और उन्होंने वहाँ पर सोने का मंदिर बनवाया। त्रेतायुग में रावण ने सोमनाथ में चांदी का मंदिर बनवाया और फिर द्रोपर युग में श्री कृष्ण ने यहाँ पर चन्दन काष्ट  का मंदिर बनवाया।
    read- चन्द्रगुप्त मौर्य का इतिहास 

    •  सोमनाथ मंदिर का विध्वंश 
    महमूद ग़ज़नवी गज़नी राज्य ( वर्तमान पाकिस्तान-अफनिस्तान सीमा क्षेत्र ) का शासक था। इसने सर्वप्रथम भारत पर हमला सन 1001 A . D .  में किया इसके बाद इसने लगभग भारत पर 17 बार हमले किये।  अक्टूबर  1025 A,D में महमूद ग़ज़नवी 30 हज़ार घोड़े और 30 हज़ार ऊट और हज़ारो पैदल सैनिक लेकर गज़नी से गुजरात की तरफ बढ़ा और जनवरी 1026 A.D में यह  सोमनाथ पंहुचा और 8 दिन तक संघर्ष करने के बाद इसने सोमनाथ पर कब्ज़ा किया और वहाँ लूटमार की और असंख्य निर्दोष लोगो को मारा। 
                                                
    गज़नी का आक्रमण 
                                     सन 1299 में अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ पर हमला किया। इस युद्ध में यहाँ के राजपूतो ने खिलजी का काफी प्रतिरोध किया परन्तु वे हार गए और खिलजी ने शिवलिंग को तोड़कर उसको दिल्ली भेज दिया। 
                              सन 1395 में गुजरात सल्तनत के ज़फर खान ने सोमनाथ पर हमला किया और उसे फिर से ध्व्स्त कर दिया और सन 1451 में महमूद बेगड़ा ने सोमनाथ पर हमला किया और वहाँ से शिवलिंग को हटाकर वहाँ मस्जिद बना दी। 
                                    सन 1665 में औरंगज़ेब ने मोहमद आज़म को सोमनाथ पर हमला करने को कहा और मोहमद आज़म ने सोमनाथ मंदिर को पुनः थोड़ दिया। 

    •      लाठी के राजकुंवर वीर हमीरजी गुहिल 
    Hammirji gohil staue

    सन 1299 में जब अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ पर हमला किया तब लाठी के राजकुंवर हमीरजी गुहिल जो की उस समय मात्र 15 वर्ष के थे , उन्होंने इस मंदिर के रक्षा के लिए अपने प्राणो की आहुति दे दी। वीर हम्मीरजी ने यह कहा था की " भले कोई आवे ना आवे मारे साथे, पण हून जइस सोमनाथ नी सखाते "(अर्थ - भले ही कोइ मेरे साथ आये या ना आये परन्तु मै सोमनाथ के रक्षा जरूर 

    • मंदिर का पुनःनिर्माण 
    महमूद ग़ज़नवी के हमले के बाद सन 1169 में कुमारपाल ने सोमनाथ मंदिर का भव्य पुनः निर्माण करवाया जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने तुड़वा दिया। 
                                                          सन 1308 में चुंडासम राजवंश के राजा महिपाल प्रथम ने सोमनाथ मंदिर की पुनःस्थापना की और लगभग 1351 के आसपास उनके पुत्र रा खेंगरा ने वहाँ शिवलिंग के स्थापना की। 
                                                            सन 1783 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पुणे के पेशवा के साथ मिलकर  सोमनाथ मंदिर के पास शिवजी का नया मंदिर बनवाया जिसका गर्भगृह जमीन से थोड़ा निचे है। इस मंदिर को आज अहिल्याबाई मंदिर के नाम से जाना जाता है। 

    •  वर्तमान मंदिर का निर्माण 
                   
    new Somnath Mandir
    सन 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तब राष्ट्र को एक करने का जिम्मा सरदार वल्लभाई पटेल को दिया गया। सरदार वल्लभाई पटेल ने जूनागढ़ रियासत , हैदराबाद रियासत और कश्मीर रियासत को छोड़ कर सभी रियासतों का भारत संघ में विलय कर दिया। जूनागढ़ के सुल्तान ने अपनी प्रजा के विरुद्ध जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिला दिया। तब जूनागढ़ के प्रजा ने आरज़ी हुकूमत की स्थापना करके 9 नवंबर 1947 को जूनागढ़ को आज़ाद किया और 12 नवंबर 1947 को सरदार पटेल जूनागढ़ आए और जूनागढ़ को आधिकारिक रूप से भारत संघ  मिलाया। 
                                            13 नवंबर 1947 को सरदार पटेल ,जाम साहेब दिग्विजय सिंह , कन्हैयालाल मुंशी और काकासाहब गाडगील ने सोमनाथ के मंदिर के टूटे अवशेषो को निरक्षण किया और सोमनाथ की ऐसे हालत देखकर सरदार पटेल ने भरी जनसभा के सामने हाथ में समुद्र का जल लेकर सोमनाथ के पुनः निर्माण की प्रतिज्ञा ली। नए मंदिर के निर्माण के लिए पुरातत्व विभाग ने उत्खनन किया और वहाँ से प्राप्त मूर्तियों को प्रभास पतन म्यूजियम में रखा गया। इस नए मंदिर के परिकल्पना श्री प्रभाशंकर सोमपुरा ने की।  इस मंदिर  शिलान्याश सन 1950 में जामसाहेब के द्वारा किया गया और 11 मई 1951 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद द्वारा इस मंदिर में प्राणप्रतिष्ठा हुई। जामनगर की महारानी गुलाबकंवरबा ने मंदिर में दिग्विजय द्वार का निर्माण किया जिसका शिलान्याश 19 मई 1970 में हुआ।  1 दिसंबर 1995 में देश के राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने इस मंदिर को देश के नाम समर्पित किया। 
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