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Thursday, 30 August 2018

Chandragupta Maurya First emperor of Indian History

                                                 चन्द्रगुप्त मौर्य

                                       
  
     

  • मौर्य साम्राज्य से पहले मगध साम्राज्य 
प्राचीन भारत के वैदिक काल मे भारत मे कई जनपद थे, इन जनपदों ने समय के साथ अपनी आर्थिक और राजनैतिक  स्थति को मजबुत करते हुए अपनेआप को महाजनपदों में तब्दील कर दिया। छठी शताब्दी ईसापूर्व में भारत में 16 महाजनपद थे।  ये 16 महाजनपद थे -
  1. काशी 
  2. कौशल 
  3. अंग 
  4. चेदि 
  5.  वत्स 
  6. कुरू 
  7. पांचाल 
  8. मतस्य 
  9. सुरसेन 
  10. अश्मक 
  11. अवन्ति 
  12. गान्धार 
  13. कम्बोज 
  14. विज्जि 
  15. मल्ल 
  16. मगध 
इन सभी महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली था 'मगध साम्राज्य'  मगध साम्राज्य का संस्थापक जरासंध को माना जाता हैं।  सबसे पहले मगध साम्राज्य पर हरयकवंश का राज था , उसके पश्चात शिशुनाग वंश और अंत में नन्द वंश का राज था। नन्द वंश के घनानंद को हराकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना करी।

  • घनानंद  
घनानंद नन्द वंश का आखरी राजा था। इसको अग्रमीज और जनेदरमिज के नाम जाना जाता है।  यह एक चंचल मति और दुर्बल मन का शासक होने के साथ साथ एक अस्थिर प्रकृति, दुराचारी व्यक्ति था। इसी के शासनकाल में सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। इसके अत्याचरो के कारण इसकी सेना और प्रजा में भारी असंतोष था , इसी असंतोष का फायदा उठाकर आचार्य चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य ने पुरे नन्द वंश का समूल विनाश कर दिया। 
  • आचार्य चाणक्य
आचार्य चाणक्य का जन्म तकशिला के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता की मृत्यु इनके बचपन में हो गई।  चाणक्य  बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले थे। उन्होंने शीघ्र ही वैदिक साहित्य, शस्त्र संचालन, मंत्र विद्या और नीतिशास्त्रा में दक्षता प्राप्त कर ली 
  • चन्द्रगुप्त मौर्य की जाति 
चन्द्रगुप्त मौर्य की जाति के विषय में काफी मतभेद है। कई इतिहासकार उसे शूद्र  बताते है परन्तु अधिकांश इतिहासकार उसे क्षत्रिय मानते है।
  1. क्या वो शूद्र था ?
चन्द्रगुप्त को शूद्र मानने वाले  इतिहासकार विष्णु पुराण और मुद्रराक्षसः का हवाला देते है और यह कहते है कि इन दोनों ग्रंथो में मौर्य वंश को शूद्र बताया गया है।        विष्णु पुराण में  यह लिखा है कि शिशुनाग वंश बाद  मगध पर राज करने वाले शूद्र होगे।  अगर इस बात को शिशुनाग वंश के बाद राज करने  वाले सभी वंशो  पर लागु किया जाए तो कण्व वंश , शुंग वंश और सातवाहन वंश भी शूद्र  होने चाहिए परन्तु ऐसा नहीं है यह सभी वंश ब्राह्मण वंश से थे। अतः विष्णु पुराण में जो लिखा गया है वो सिर्फ नन्द वंश पर लागु होता है ना की मौर्य वंश पर।    मुद्रराक्षस  में चन्द्रगुप्त को 'कुलहीन' कहा गया है जिसका अर्थ कई विद्वानों ने शूद्र जाती से लिया है। परन्तु इसका अर्थ शूद्र न होकर  'वैभवहीन' है क्योकि जिस समय चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ था उस समय इसका परिवार राजत्व खो चूका था। 
    2.क्या चन्द्रगुप्त क्षत्रिय था

 सभी जैन और बौद्ध ग्रंथो में चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय मानते है। बौद्ध ग्रंथ 'महावंश ' के अनुसार वह मोरिया  क्षत्रियो के वंश में पैदा हुआ था। मोरिया शक्यो की एक शाखा थी जो कोशल नरेश के संहार से बचने के लिए  पिपल्विन चले गये। बौद्ध ग्रंथ 'दिव्यावदान ' में बिन्दुसार और अशोक अपने आप को क्षत्रिय बताते है।   चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि "उच्च कुल में पैदा राजा चाहे दुर्बल क्यों न हो निम्न कुल में उत्पन्न सबल राजा से श्रेस्ठ है " अतः चाणक्य ने जिसे राजा बनाया था वो चन्द्रगुप्त क्षत्रिय  ही था।

 Read    First Ruler Of Chauhan Dynasty Of Nadol 

  • प्रारम्भिक जीवन 
चन्द्रगुप्त की माँ मौर्य नगर की रानी थी। जब वह गर्भवती थी तब उस नगर पर एक अन्य राजा ने आक्रमण किया और मौर्य नगर के राजा को मार दिया।  गर्भवती रानी  अपने भाई के पास चली गई और अपने नवजात बच्चे को फेक दिया।  इस नवजात बच्चे की रक्षा चंद नामक एक वृषभ ने की और  उस बालक का  नाम  पड़ा चन्द्रगुप्त। बाद में उस बच्चे को गोपालक ले गया  औ र गोपालक से वो बच्चा शिकारी के पास पंहुचा।  इसे शिकारी के यहाँ वो बच्चा बड़ा हुआ, यही वो बच्चो के साथ राजकीलम खेल खेलता था। एक दिन चाणक्य ने बच्चो का यह खेल  दिखा और उसे चन्द्रगुप्त प्रतिभावान लगा और चाणक्य ने  उसे 1000 कार्षापण में खरीद लिया। चन्द्रगुप्त चाणक्य के साथ तक्षशीला आया  और यही पर 8 वर्ष तक इसकी  विधिवत शिक्षा दीक्षा सम्पन हुई। 


  • मगध सम्राट - चन्द्रगुप्त मौर्य 

  1. पंजाब और सिंध विजय 
जब सिकंदर भारत छोड़कर वापिस लौट गया तब पंजाब और सिंध में क्रमश फलीप II और यूडेमस क्षत्रप थे।  जब चन्द्रगुप्त ने यूनानियो के खिलाफ एक राष्ट्रीय युद्ध छेड़ा तब भारतीय सेनिको ने फलीप II की हत्या कर दी और यह सब सुनकर यूडेमस भारत छोड़कर भाग गया।  इस  विद्रोह के बाद में चन्द्रगुप्त पंजाब और सिंध का राजा बना। 

     2. मगध विजय 
सिंध और पंजाब विजय के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध की तरफ  कूच किया। यहाँ इसका सामना घनानंद के सेनापति भदशाल से हुआ और इस युद्ध में घनानंद की हार हुई। इस युद्ध में सैनिक शक्ति के साथ साथ चाणक्य ने साम, दाम , दंड और भेद की कूटनीति का  प्रयोग किया। इस युद्ध के बाद सन 322 इ.पु. में चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक हुआ। 

  • सेलुकस से युद्ध और सकल भारत विजय 
मगध सम्राट बनने के बाद चन्द्रगुप्त अपने राज्य का विस्तार करने लग गया। उसने अपने साम्राज्य की सीमा पश्चिम में गुजरात तक फैलाई और दक्षिण में उसने कर्नाटक तक अपनी विजय पताका लहराई।
                        सन 305 इ.पु. में सेलुकस नाम के  एक यूनानी  ने फिर सिंधु नदी को पार किया। यह सेलुकस सिकंदर का पूर्व सेनापति और सिरिया का शासक था।  लेकिन इसे बार समय बदल गया था जब सिकंदर ने आक्रमण किया था तब भारत में राजनैतिक अस्थिरता थी परन्तु इस बार लगभग पुरे देश पर मौर्य वंश का एकछत्र राज था इसी कारण 303ई.पु. में  सेलुकस की हार हुई और उसे संधि करनी पड़ी।  इस संधि की शर्तो के अनुसार चन्द्रगुप्त को चार प्रान्त मिले कंधार , काबुल , हेरात , मकरान और इसी सिंधी में सेलुकस ने अपनी बेटी का विवाह चन्द्रगुप्त से करवाया।  चन्द्रगुप्त ने सेलुकस को 500 हाथी दिए और सेलुकस ने चन्द्रगुप्त के दरबार में मेगस्थनीज नाम का राजदूत भेजा।
                                                                   इस युद्ध के बाद चन्द्रगुप्त का साम्राज्य हिन्दुकुश पहाड़ियों तक पहुंच गया। 
Read- Wars that Change Indian History
  • साम्राज्य विस्तार   
चन्द्रगुप्त के राज्यकाल में मौर्य साम्राज्य का विस्तार उत्तरपश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला था। 

  • चन्द्रगुप्त की जैन दिक्षा और मृत्यु 
चन्द्रगुप्त ने अपने अंत समय में जैन धर्म में दिक्षा ले ली और चंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या करी।  यही चन्द्रगुप्त ने संलेखना पद्ददति द्वारा 298 ई.पु. में अपने प्राण त्याग दिए। 

  • चन्द्रगुप्त  मौर्य का ऐतिहासिक महत्व 


चन्द्रगुप्त एक सम्राट होने से पहले वो एक क्रन्तिकारी था।  इसने ना सिर्फ यूनानियों को भारत से खदेड़ा अपतु इसने भारत में उस मौर्य साम्राज्य की स्थापना करी जिसमे अशोक जैसा महान सम्राट दिया। 
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Monday, 13 August 2018

15 august- Important date in Indian history and also in Britain history

                                         15 August 

Whenever the Indians listen to that today is 15 August then the picture of the tricolor waving over the Red Fort in his heart and mind comes out. On hearing the name of 15 August, the sense of patriotism awakens in an every Indian. This date holds significance because on this date India gets freedom from Britisher and prove to the world that British may also have the sunset. The result of the sacrifices of Bhagat Singh, Sukhdev, Chandrashekhar Azad, Lala Lajpat Rai, Rani Lakshmibai and leader like Mahatma Gandhi, Subhas Chandra Bose, Sardar Patel, was that on August 15, 1947, India got freedom from British Empire.
But think that why Britisher give freedom on 15 August only? why they do not give freedom on 26 January whereas Congress was celebrating 26 January as freedom day? many people want to know why Britisher give freedom on 15 August it was coincidently chosen a date or this has historical significance. Let's know why we get freedom on 15 August.

Relation Between 15 August and World War Second 

The Second World War was fought between Axis Power( Germany, Japan, and Italy) and Allied Power( U.S.A, U.K, France, China and the Soviet Union). This war was started when Germany attacked Poland in 1939 than U.K and Germany started the war with  Germany. 

On August 6, 1945, and August 9,1945, U.S.A attacked Hiroshima and Nagasaki with the Nuclear bomb then  War Directive Council of Japan declared the Emergency in Japan. On August 10,1945 the foreign minister of Japan send the Treaty Proposal to America and on August 15, 1945, Japan's emperor in front of the whole world and in front of his public, declare that they were sundering to the Allied power. Japan's emperor said to his public that" enemies use the new kind and very destructive bomb. We cannot measure this power of destruction this power killed many innocent people if we continue the war then it will destroy the whole of Japan."
At that time the Commander of Allied Power was Lord Mountbatten and coincidently the Viceroy of India in 1947 was also Lord Mountbatten. Lord Mountbatten consider 15 August as very pious day because on this day Japan quit the world war. 
So that's why 15 August is not only an important day for Indians but it very important date for Japanese and Britisher also.

To know about wars that change Indian history open the link
 http://indianhistoryfrombeginning.blogspot.com/2018/08/war-that-change-indian-history.html

Tuesday, 7 August 2018

war that change the Indian history

                

     War That change Indian History

  1. Dashrajan war
detail of this war was given in the 7th division of Rigveda. This war was fought between King Sudas, the ruler of Bharat dynasty and the 10 kings of India. the reason for this war was to remove Viswamitra from the priest position by King Sudas. Viswamitra made a group of 10 kings who fought with King Sudas. In this war, King Sudas win.


2. War of Hydaspes

This war took place between Alexender the great and Porus in 326B.C. This war was fought near the Jhelum river. In this war, Alexender won and Porus was caught. Seeing Porus self-esteem Alexender overcame him instead of killing him

3. Seleucid Mauryan war

Seleucus was the ruler of Syria and commander of Alexender. He invaded India in 305B.C. In 303B.C Chandragupta Maurya beat him and made a treaty with him. Under this treaty, Seleucus married his daughter with Chandragupta.

 4. Kalinga war      

This war was fought between King Ashoka and the Kalinga kingdom in 261B.C. Ashoka's victory took place in this war but Ashoka's heart changed as a result of the horrific massacre in the war and he adopted Buddhism. Now Ashoka promotes "Dham" instead of war.

5. First Battle of Terrain                         

In 1191A.D, this war was fought between Mohammad Gohri and Prithviraj Chauhan, ruler of Delhi. Gohri had a very bad defeat in this war, but Chauhan made a big mistake of leaving him alive, which proved very fierce for him and India.

6. Second Battle of Terrain

A year after the first battle of Terrain, in 1192A.D Gohri again attacked India, but this time the dice turned up and Prithviraj's army could not stand against Gohri's organized army and Prithviraj was defeated. This war was the decisive battle in the Indian History because this war laid the foundation of Muslim rule in India.

7. First Battle of Panipat

This war was fought between Babur and last sultan Ibrahim Lodhi of Delhi on April 20, 1526. Ibrahim and his army challenged the Babur's army but in the end, Ibrahim Lodhi lost the war and died in the battlefield. This war broke the back of the Lodhi power and the entire area of Delhi and Agra reached Babur's hand. This war laid the foundation of the powerful Mughal empire.

7. Battle of Khanwa

When Babur won the battle of Panipat and became the king of Delhi, then his contemporary King who could become the barrier to his victory was Maharana Sangha of Mewar. So it was possible to have a war between them and on 17 March 1527, this historic war was fought on the field of Khanwa. Maharana was getting victorious at the beginning of the war but suddenly Rana felt an arrow and he fell unconscious. Later Maharana army was maiden by Jhala Ajha, in which he was defeated. 

8. Second Battle of Panipat

 This war was fought between Akbar's guardian Bairam  Khan and Adil Shah Suri's wazir Hemu on 5th November 1556. In this war, the Mughals took over Hemu's artillery, but initially, war is in favor of Hemu but suddenly an arrow took place in Hemu's eyes and he fell unconscious. Afghans were defeated and Hemu was killed

9. Battle of Haldighati

 On 18 June 1576, the war between Akbar’s commander Man Singh and Rana Partap of Mewar was fought in Haldighati. The number of Rana's army in this war was 3000 and the army of Mughals was number 5000. in this war, Rana and his army fought bravely but in the end, victory was only for the Mughals. There is a misconception about this war that it was a Hindu Muslim war, but it can not be true because in this war commander of Mughal army was the Hindu king Man Singh and Hakim Khan, a Rana commander who was a Muslim  

10. Battle of Plassy

Battle of Plassy occurred between Sirajud-daula and Robert Clive on 23 June 1757. in this war, the strength of Nawab army was 50000 and the strength of the British army was only 3200 but due to the commander of Nawab, Mir Jafar British won the battle. Nawab runs away to the Patna where he was murdered by Mir Jafar son. This war laid the foundation of British rule in India.


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