onclick anti ad block

Saturday, 29 September 2018

Story of the first Chauhan Ruler Of Nadol

हम जब भी Indian History के बारे में जानेगे या पढ़गे तब कही न कही हम राजस्थान का नाम जरूर पढ़गे क्योकि राजस्थान के इतिहास के बगैर Indian History पढ़ना एक प्रकार कि मूर्खता है। राजस्थान की धरती संघर्ष की धरती है, यहाँ के हर क्षेत्र में किसी  न किसी  वीर योद्धा, वीरांगना या किसी महान संत की कहानी का गुणगान जरूर गया जाता है। राजस्थान की इस पुण्य भूमि पर महाराणा प्रताप , महाराणा सांगा , राव चंद्रसेन , महाराजा सूरजमल जैसे अनेक देशभक्त राजा हुए वही यहाँ पर तेजाजी ,पाबूजी ,रामदेवजी , गोगाजी और देवनारयणजी जैसे लोकदेवता हुए है जिन्होंने अपने पुण्य कर्मो द्वारा देवत्व प्राप्त किया।
                                                          अब आप यह सोच रहे होगे की मै आपको राजस्थान के बारे में क्यों बता रहा हूँ? तो मै आपको बतादूँ की आज हम जिस राजा के बारे में जानने जा रहे है वो राजा नाड़ोल का राजा था। वर्तमान में नाडोल राजस्थान का एक कस्बा है जो आशापुरा माता मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। नाडोल जोधपुर से 120km दूर है और उदयपुर से 131km दूर है। आज भले ही नाडोल एक कस्बा है परन्तु प्राचीन समय में यह राजस्थान के प्रमुख व्यपारिक शहरों में से एक था।
                                                               तो चलिए नाडोल को जानने के बाद अब हम जानते है यहाँ के महान राजा राव लक्ष्मण(950 -982 A.D)  के बारे में।
Note- इस ऐतिहासिक कहानी को मैने एक डाइरी की तरह लिखा है जिसमे राव लक्ष्मण अपनी कहानी स्वं बताएगे। मेने यह तरीका इस लिए अपनाया है क्योकि पढ़ने वाले इतिहास थोड़ा रोचक लगे। 

नाडोल में चौहान राजवंश के संस्थापक- राव लक्ष्मण  

मेरा जन्म शाकम्भरी(सांभर)  के चौहान वंश के राजा वाक्पतिराज और आत्मप्रभा के पुत्र के रूप में हुआ।  मै बचपन से ही महत्वकांक्षी और स्वाभिमानी प्रवर्ति का था। मेरे एक बड़े भाई थे सिंहराज जो बहुत ही वीर प्रवर्ति के थे। जब मेरे पिता वाक्पतिराज की मृत्यु हुई तब मेरे बड़े भाई सिंहराज को उत्तराधिकारी बनाया गया और मुझे छोटी सी जागीर दी गयी परन्तु मेरी महत्वकांक्षा इससे शांत नहीं होने वाली थी। अतः मैने शाकम्भरी छोड़कर कही ओर जाकर पुरषार्थ करने की सोची और मै अपनी पत्नी उर्मिला और एक सेवक के साथ शाकम्भरी छोड़कर चला गया। हम तीनो शाकम्भरी के दक्षिण की तरफ चले जा रहे थे, तभी पुष्कर से थोड़ी दूर मेरी पत्नी को थकान होने लगी परन्तु मैने उसका मनोबल बढ़ाया और पुष्कर पहुंचे। पुष्कर पहुंच कर हमने पुष्कर झील के पवित्र जल में नहाए और ब्रंहपूजा की। कुछ समय पुष्कर थकान मिटाने के बाद हम अरावली के पर्वतमालाओ को पार करके हम नाडोल पहुंचे। नाडोल पर इस समय सामंत सिंह चावड़ा का शासन था , यह एक अयोग्य शासक था इस कारण से नाडोल की  प्रजा  को मेद जाति के लूटेरो ने परेशान कर रखा था।
                         जब हम नाडोल पहुंचे तब रात्रि होने वाली थी इसलिए हम  वहा एक शिव मंदिर में विश्राम करने लगे। जब सुबह हुए तब वहा का पुजारी पूजा करने के लिए आया और हमें वहा सोता देख समझ गया की हम परदेशी है और वो अपना काम करने लग गया।  जब वह पूजा करके वापस लोटा तब भी हमें सोता देख मेरे पास आया और मुझे उठाकर पूछा की ''तुम लोग कौन हो " तब मैने कहा की "मै शाकम्भरी के राजा सिंहराज का छोटा भाई लक्ष्मण हु और पुरषार्थ करने के लिए अपना राज्य छोड़ चुका हूँ। " इतना सुनते ही उस पुजारी ने मेरा आदर सत्कार किया और मुझसे पूछा की "क्या आप नाडोल की प्रजा की सेवा करना चाहेगे क्योकि यहाँ की प्रजा मेद लूटेरो से बहुत परेशान है और उनको आप जैसा ही कोई वीर पुरुष इनसे बचा सकता है " यह सुनकर मैने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और अगले दिन मुझे नगर रक्षक बना दिया।
                                      मुझे आशापुरा माता की कृपा से अपनी काबिलियत साबित करने का मौका मिल चूका था और नगर रक्षक बनने के कुछ दिन बाद उन लूटेरो ने फिर से नाडोल पर हमला किया परन्तु इस बार नाडोल में घुसने से पहले उनको मेरा सामना करना था। आज यह यद्ध मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था क्योकि यह युद्ध  मेरे ऊपर नाडोल की प्रजा के विश्वास की परीक्षा  था। इस युद्ध में मैने और मेरी सेना मेदो को बुरी तरह से हराया और उने भगा दिया। लेकिन यह मेद आसानी से हार मानने वाले नही थे उन्होंने पुनः संगठित होकर नाडोल पर हमला किया लेकिन इस बार भी उनकी हार हुई और वे वहा से भागने लगे तब मैने अपनी एक सैनिक टोली बनाकर उनका पीछा किया और अरावली के पर्वतो में घुसके उन मेदो को मारा। इस युद्ध में हम विजय तो हुए परन्तु मै घायल होकर बेहोश हो गया और सैनिक मुझे नाडोल लेकर आने लगे तभी रास्ते में मुझे होश आया तब मैने एक सैनिक से पानी मगवाया वो सैनिक पास ही की एक बावड़ी से मेरे लिए पानी लेकर आया। मेरी यह हालत देख कर नगरवास्यो को बहुत दुःख हुआ इसलिए वे मेरे जल्दी ठीक होने की प्राथना करने लगे। इसी बीच मदो को जब यह बात पता चली की मै गम्भीर रूप से घायल हूँ तब उन्होंने फिर नाडोल में उत्पात मचाना शुरू किया। इन सब को देख कर मैने आशापुरा माता से यह प्राथना की वो हमें इस दुविधा से बचाए। इस प्रार्थना का ही प्रभाव था की अगले दिन मुझे मालवा की तरफ से आते हुए 13000 घोड़े मिले जिनपर केशरमिश्रित जल छिड़ककर मै और मेरी सेना नाडोल और उसके आस पास के क्षेत्रो जिसे गोडवाड़ कहा जाता है वहा से सभी मेदो को खत्म कर देते है और वहा शांति स्थापित हो जाती है। इस विजय के बदले नाडोल की प्रजा वहाँ के शासक सामंत सिंह चावड़ा को हटाकर मुझे अपना राजा बना देती है।
                                                    जब मुझे राजा बना दिया गया तब मैने जिस बावड़ी से पानी पिया था उसके नजदीक मैने आशापुरा माता का मंदिर बनवा दिया और जिस बावड़ी से मैने पानी पिया था उस बावड़ी को पक्का बनवा दिया।
                            मैने मेरी जिंदगी में वो पाया जो हर किसी के बस की बात नहीं है। मै चाहता तो मै मेरे पिता द्वारा दी गयी जागीर से संतुष्ट हो सकता था परन्तु मैंने ऐसा नहीं किया क्योकि मुझे भी उनके जैसा ही महान बनना था और मैंने इस संसार को बता दिया की अगर अपने आप पर और अपने भगवान पर भरोसा हो तो अकेला मनुष्य भी बहुत कुछ कर सकता है। 

Note -जाने भारत के पहले महान सम्राट के बारे में 

                                  

No comments:

Post a Comment

Latest Post

Samudragupta Bharat ka ajay shasak

Samudragupta भारत का एक ऐसा शासक था, जो अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा। Samudragupta ने भारत के ऐसे युग की स्थापना की जो आज भारतीय इति...