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Friday, 14 September 2018

Religious Reformer in Indian History

                                                          भारत के धर्म सुधारक
हम जब भी इतिहास पढते है तब हमे धर्म के बारे मे कही न कही पढना ही पडता है भले ही आप नास्तिक हो या आस्तिक। आप सभी यह बात जानते है कि भारतीय इतिहास और धर्म आपस मे किस प्रकार एक दुसरे के पुरक है। अगर हम इतिहास मे से अगर धर्म को निकाल दे तो शायद इतिहास मे पढने लायक बहुत कम बचेगा।
धर्म एक ऐसा शब्द है जिसकी व्याख्या करना मेरे लिए बहुत कठिन है लेकिन कम शब्दो मे कहु तो "धर्म वह मार्ग है जिसके माध्यम से मानवमात्र अपने सृजन करने वाले परमात्मा को प्राप्त कर सकता है"।परंतु कुछ भष्ट्र आचरण वाले लोगो के कारण यह मानवहीतकारी मार्ग दुषित हो जाते है और इनमे सुधार की आवश्कता आ जाती है और इन्ही सुधारो को हम धर्म सुधार कहते है।
अतः इस पोस्ट मे मै आपको भारत के कुछ धर्म सुधारको के बारे मे बताऊगा।
  1.  गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध का जन्म 563ई.पू. मे शुद्धोधन और महामाया के पुत्र के रूप मे हुआ। शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के राजा थे। बुद्ध के जन्म के समय ऋषि अतिश, देवल और कौण्डिन्य ने यह भविष्यवाणी की थी के यह बालक अगर संसारीक भोग विलास मे रहेगा तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और अगर संसार से विरक्त होगा तो तथागत बनेगा। इसी कारण राजा ने बुद्ध को सभी भोग विलास वाली वस्तुओ से लिप्त रखा परंतु नियती को कुछ और ही मंजुर था और 29 वर्ष की आयु मे गृहत्याग दिया और 35 वर्ष की आयु मे इन्हे ज्ञान प्राप्त हो गया। सन् 483ई.पू. मे 80 वर्ष की आयु मे इनकी मृत्यु हो गई।
  •       प्रमुख कार्य
      - गौतम बुद्ध ने यज्ञ मे दी जाने वाली बली का विरोध किया और जीवमात्र से प्रेम करने व अहिंसा के मार्ग पर चलने को कहाँ।
      - इन्होने तत्कालीन समाज मे व्यापत भेदभाव का विरोध किया। इन्होने अपने संघ मे हर जाति के लोगो को प्रवेश दिया।
      - इन्होने महीलाओ को भी उचित सम्मान दिया। इनहोने संघ मे आम्रपली नामक वेश्या को भी प्रवेश दिया।
     - गौतम बुद्ध ने कर्मवाद को बढावा दिया। इन्होने ज्ञान प्राप्ति का मार्ग कर्म को बताया।
   2. आदी शंकराचार्य

आदी शंकराचार्य का जन्म 788ई. मे केरल के कलादी ग्राम मे हुआ। इनके पिता का नाम शिवगुरू और माता का नाम आर्याम्बा था। इन्होने 8  वर्ष की  आयु मे गृहत्याग किया और गोविन्द योगी को अपना पहला गुरू बनाया। इसके बाद गौडपद को गुरू बनाया। इन्होने नर्मदा नदी के तट पर महिष्मति मे मण्डनमिश्र को शास्त्रार्थ मे हराया। इनकी मृत्यु 820ई. मे केदारनाथ मे हुई।

  • प्रमुख कार्य
         -  इन्होने भारत मे सांस्कृतिक एकता की स्थापना करने के लिए चार मठो की स्थापना की जो भारत के चार कोणो मे है।
         - इन्होने उपनिषद, ब्रह्मसुत्र एंव गीता पर अपना भाष्य लिखा।
        - इनका सिद्धान्त अद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार आत्मा एवं ब्रह्म मे कोई भेद नही, ब्रह्म निर्गुण और सत्य है जबकी जगत मिथ्या है।
  3. कबिरदास 

कबिरदासजी का जन्म लगभग 1398ई. मे लहतारा ताल काशी मे हुआ। इनका पालन पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाह दम्पति ने किया। इनके गुरू रामानन्द थे। कबिरदास जी अनपढ थे, इनके दोहो का संग्लन इनके शिष्यो ने किया। इनकी मृत्यु मगहर मे हुई।

  •   प्रमुख कार्य
        - इन्होने तत्कालीन समाज मे व्यापत जातिप्रथा का विरोध किया।
        - इन्होने हिन्दु मुस्लिम एकता पर जोर दिया
       -इन्होने हिन्दु मुस्लिम दौनो धर्मो मे व्यापत पाखंड का अपने दौहो के माध्यम से विरोध किया
   4.स्वामी विवेकानंद 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था इनके पिता विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।  इनके गुरु रामकृष्ण परमहंस थे।  1886 में  रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद इन्होने सन्यास लिया।  11 सितम्बर 1893 में विश्व धर्म संसद में भाग लेने शिकागो गए और वहा अपना सुप्रसिद्ध भाषण दिया। इन्होने इंग्लैड और अमेरीका मे भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। 5 मई 1897 मे रामकृष्ण मिशन की स्थापना करी। इनकी मृत्यु 4 जुलाई 1902 मे हुई।
  •   प्रमुख कार्य
       - इन्होने जातीय भेदभाव का विरोध किया। इनका मानना था कि सामाजिक, धार्मिक परम्पराओ एवं मान्यताओ को तभी स्वीकार करना चाहिए जब यह उचित जान पडे।
      -इनके द्वारा चलाया गया रामकृष्ण मिशन मानवतावादी दृष्टिकोण रखता है और इस मिशन ने कई विद्यालय, अनाथालय, चिकित्सालय आदी की स्थापित किए।
     -इनका ध्येय वाक्य था "नर सेवा ही नारायण सेवा" 
 5. स्वामी दयानंद सरस्वती
 स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 मे गुजरात के मौरवी के पास टंकारा के ब्राह्मण परिवार मे हुआ। इनके पिता अम्बाशंकर वेदो के विद्वान थे। सन् 1860 मे यह स्वामी विरजानन्द से मिले और उनके शिष्य बन गए। सन् 1877 मे इन्होने आर्य समाज की स्थापना की। 1883 मे अजमेर मे इनकी मृत्यु हुई।
  •   प्रमुख कार्य
      - इन्होने कर्म प्रधान वर्ण व्यवस्था का सर्मथन कीया और जातिप्रथा और छुआछुत का विरोध किया।
     - इन्होने बालविवाह, दहेजप्रथा, पर्दाप्रथा और बहुविवाह आदी सामाजिक बुराइयो को समापत करने का प्रयास किया।
   -इन्होने मूर्तिपुजा, पशुबली,बहुदेववाद का कडा विरोध किया।
   - इनका ध्येय वाक्य था " वेदो की ओर चलो"।










   


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