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Wednesday, 31 October 2018

The untold story of Rajasthan Hero Kesari Singh Barahath in hindi

Indian History में Rajasthan का नाम न लिया जाए तो ये शायद नाइंसाफी होगी क्योंकि राजस्थान का इतिहास है ही ऐसा। जब भी भारत पर हमले हुए तब rajasthaniyo ने हँसते हँसते अपने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण दाव पर लगा दिए। कुछ लोगो ये कहते है की Rajasthan  के लोगो ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका निभाई ? तो चलये आज उन लोगो को Rajasthan  के एक ऐसे वीर की कहानी बताते है जिसने न सिर्फ अपने आप को बल्कि अपने पुरे परिवार को देश के नाम समर्पित कर दिया। इस वीर की कलम में इतनी ताकत थी की उसने महाराणा प्रताप की सन्तानो को उनका भुला स्वाभिमान याद दिलवा दिया और महाराणा प्रताप की पाग को विदेशियों के सामने झुकने से बचा लिया। तो आज इस पोस्ट में जानते है क्रान्तिकारी वीर केसरी सिंह बारहट के बारे में।
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प्रारंभिक जीवन 

Rajasthan के इस वीर का जन्म ठाकुर कृष्ण सिंह बारहठ के पुत्र के रूप 21 नवंबर 1872 में Rajasthan के तत्कालीन शाहपुरा रियासत के देवपुरा गांव में हुआ था। केसरी सिंह जी के जन्म के एक महीने बाद उनकी माता का देहांत हो गया इसलिए इनका लालन पालन इनकी दादी माँ ने किया। 

शिक्षा 

इनकी शिक्षा उदयपुर में हुई। इनको बांग्ला, मराठी , गुजराती आदि भाषा के साथ  साथ  इनको इतिहास , मनोविज्ञान , दर्शन ,ज्योतिषशास्त्र और खगोलशास्त्र का ज्ञान था। डिंगल पिंगल भाषा का ज्ञान तो इनको चारण कुल में जन्म लेने के कारण विरासत में मिला हुआ था। बनारस के पंडित गोपीनाथ  ने इनको संस्कृत का ज्ञान दिया और इनके स्वाध्याय के लिए इनके पिता का पुस्तकालय "कृष्ण वाणी विलास " उपलब्ध था। 

केसरी सिंह बारहठ का जीवन 

                                                     
freedom fighter
ठाकुर केसरी सिंह बारहठ 
सन 1903 में लार्ड कर्जन ने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के अवसर पर दिल्ली में भारतीय राजाओ का दरबार आयोजित किया जिसमे उदयपुर के महाराणा फतेह सिंह को भी बुलाया गया। महाराणा फतेह सिंह उस दरबार में शामिल होने के लिए जा रहे थे तो दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनको केसरी सिंह बारहठ के द्वारा लिखित 13 सोरठो का एक पत्र मिला। इस पत्र में केसरी सिंह ने महाराणा के पुरखों का गुणगान करते हुए फतेह सिंह को धिक्कारा था।  इस पत्र को पढ़कर महाराणा का सोया हुआ गौरव जाग गया और उन्होंने दिल्ली में होते हुए भी  दरबार में न जाने का निर्णय लिया।  इन 13 सोरठों को "चेतावनी रा चुगटिया" नाम से जाना जाता है।
                                                       केसरी सिंह बारहठ ने सन 1910 में गोपाल सिंह खरवा के साथ मिलकर "वीर भारत सभा" नामक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। साधु प्यारेलाल हत्याकांड में इन्हे सन 1914 में  जेल में दाल दिया गया  और 20 वर्ष का कारावास की सजा सुनाई गई। केसरी सिंह को बिहार के हज़ारी बाग जेल में रखा गया। जेल में केसरी सिंह को अपने पुत्र प्रताप सिंह बारहठ की शहादत की ख़बर मिली तब उन्होंने अपने बेटे के बारे में कहा "भारत माता का पुत्र उसकी मुक्ति के लिए शहीद हो गया उसकी मुझे बहुत प्रसंता है "
                                            जेल से छूटने के बाद सन 1922 में वे सेठ जमनालाल बजाज के निमंत्रण पर वर्धा चले गए और उनकी मुलाकात विजय सिंह पथिक से हुई और इनकी मृत्यु सन 1941 में हुई।
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केसरी सिंह के पुत्र प्रताप सिंह का बलिदान 

केसरी सिंह बारहठ को जब यह खबर मिले की रास बिहारी बोस ने सशस्त्र क्रांति शुरू की है तब उन्होंने अपने बेटे प्रताप सिंह , अपने भाई जोरावर सिंह और अपने जमाता ईश्वर दान आसिया को उनके पास भेजा। सन 1917 में प्रताप सिंह बारहठ को "बनारस षडयंत्र अभियोग" में पकड़ लिया गया। न्हें 5 वर्ष के लिए बरेली की केंद्रीय जेल में बंद किया गया। जेल में उन्हें भयानक यातनाएँ तथा प्रलोभन आदि दिये गए। उनसे कहा गया कि यदि वे पूरे कार्य का भेद बता दें तो उनके पिता को जेल से मुक्त कर देंगे, उनकी जागीर लौटा दी जायेगी, उसके चाचा पर से वारंट हटा लिया जायेगा, लेकिन वीर प्रताप ने अपने क्रान्तिकारी साथियों के बारे में कुछ नहीं बताया। उन्होंने मरना स्वीकार कर लिया, पर राष्ट्र के साथ गद्दारी नहीं की। जब उन्हें उनकी माँ की दशा के बारे में बताया गया तो वीर प्रताप ने कहा कि- "मेरी माँ रोती है तो रोने दो, मैं अपनी माँ को हंसाने के लिए हज़ारों माताओं को नहीं रुलाना चाहता।" अंत में अंग्रेज़ सरकार की अमानुषिक यातनाओं से 27 मई1918 को मात्र 22 वर्ष की आयु में प्रताप सिंह शहीद हो गए।  

केसरी सिंह के भाई जोरावर सिंह का बलिदान 

जोरावर सिंह ने रास बिहारी घोष के साथ मिलकर दिल्ली के 'चांदनी चौक' में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय पर बम फेंका, जिसमें हार्डिंग घायल हो गया तथा मृत्यु से बाल-बाल बचा। इस पर महात्मा गाँधी ने उसे बधाई का तार भेजा था। इस हमले में वायसराय तो बच गया, पर उसका ए.डी.सी. मारा गया। जोरावर सिंह पर अंग्रेज़ सरकार ने इनाम घोषित कर दिया, किंतु वे पकड़ में नहीं आये। वे एक संन्यासी की तरह फ़रार रहते हुए ग्राम-ग्राम जाकर धर्म और देशभक्ति का जनजागरण करते रहे। अंग्रेज़ों से छिपने के दौरान ही भारी निमोनिया और इलाज न करा पाने के कारण 1939 में वे कोटा में शहीद हो गए।

 केसरी सिंह द्वारा शिक्षा प्रसार 

केसरी सिंह बारहठ ने समाज विषेशकर क्षत्रिय समाज को अशिक्षा  के अभिशाप से मुक्त करने के लिए अनेक  योजना बनाई। उस समय अंग्रेज़ो द्वारा स्थापित "मेयो कॉलेज अजमेर" में पढ़कर सभी राजे -राजकुमार अपनी जनता को और अपने क्षात्र धर्म को भूलकर अपनी जनता को से दूर हो गए थे। इसलिए इन्होने अजमेर में "क्षत्रिय कॉलेज" की स्थापना की जिसमे राष्ट्र भावना  शिक्षा दी जाती थी। इसके साथ ही इन्होने राजस्थान के होनहार छात्रों को सस्ती तकनीक शिक्षा दिलाने के लिए उन्हें जापान भेजने की योजना बनाई। इन्होने चारण जाति और क्षत्रिय जाति को शिक्षित कर उन्हें राष्ट्र स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने को प्रेरित करते थे। 

केसरी सिंह द्वारा लिखित साहित्य 

केसरी सिंह बारहठ ने " रूठी रानी", "प्रताप चरित्र" , "राजसिंह चरित्र" ,"दुर्गादास चरित्र" आदि इनके द्वारा लिखित कुछ ग्रंथ है।  

                                          
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