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Tuesday, 16 October 2018

great women of Indian History In hindi

आज इस पोस्ट मै आपको  ऐसी कुछ Great women  के बारे मे बताने जा रहा हुँ जो न सिर्फ Indian History मे बल्की पुरे विश्व के History  मे अपनी अनोखी छाप छोडती है।इन women  ने शिक्षा से लेकर राजनीति तक और भक्ति से लेकर शक्ति तक के क्षेत्रो मे जिस प्रकार अपने लौहा मनवाया उससे इन्होने ये साबित कर दिया की भारतीय स्त्रीयाँ अबला नही सबला है। तो चलिए जानते great women of Indian History के बारे में
  • गार्गी
गार्गी वैदिक काल की एक विदुषी महिला थी।इनके पिता महर्षि वाचकनु थेइसलिए इनका नाम वाचकन्वी रखा गया और महर्षि गर्ग के कुल मे जन्म लेने के कारण इन्हे गार्गी नाम से जाना जाता है।
            गार्गी एक महान प्राकृतिक दार्शनिक, वेदो की व्याख्याता और ब्रह्म विद्या की ज्ञाता थी। इन्होने शास्त्रार्थ मे कई विद्वानो को हराया था। एक बार राजा जनक द्वारा आयोजित यज्ञ मे गार्गी ने महर्षि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थ मे गार्गी के द्वारा पुछे गए प्रशनो के उत्तर देने के लिए महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्रह्म दर्शन का प्रतिपादन करना पड गया।
  • मैत्रयी
मैत्रेयी वैदिक काल की विदुषी और ब्रह्मवादनी स्त्री थी।ये मित्र ऋषि की कन्या थी। राजा जनक ने दरबार मे शास्त्रार्थ का आयोजन किया और इस आयोजन मे मैत्रयी ने कई विद्वानो को शास्त्रार्थ मे हरा दिया और अन्त मे इनका सामना महर्षि याज्ञवल्क्य से हुआ। इस शास्त्रार्थ मे याज्ञवल्क्य की हार हुई।महर्षि मैत्रयी को अपना गुरू बनाना चाहते थे परंतु मैत्रेयी ने उनसे विवाह कर लिया। मैत्रेयी ने उनसे विवाह इसलैए किया क्योकी उन्हे पुरी सभा याज्ञवल्क्य समान विद्वान नही मिला। कुछ सालो बाद महर्षि याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ आश्रम त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम मे जाने का निर्णय लिया। तब उन्होने अपनी दोनो पत्नियो कात्यानी और मैत्रेयी मे सम्पति बाटना चाहते थे परंतु मैत्रयी ने सम्पति की जगह उशके साथ वानप्रस्थ जाने का निर्णय लिया।
  • महाप्रजापति गौतमी
महाप्रजापति गौतमी कोलिय राज्य की राजकुमारी थी और इनका विवाह कपिलवस्तु के शाक्य राजा शुद्धोधन से हुआ था। ये गोतम बुद्ध की मौसी और दत्तक माता थी।
            पारम्भ मे बोद्ध संघ मे स्त्रीयो का प्रवेश वर्जित था। बोद्ध संघ मे स्त्रीयो को प्रवेश करवाने के  लिए महाप्रजापति ने काफी संघर्ष किया। इन्होने सर्वप्रथम कपिलवस्तु मे बुद्ध से संघ मे स्त्री प्रवेश के लिए अनुरोध किया परंतु बुद्ध ने उसे अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार महाप्रजापति ने कुल तीन असफल प्रयास किए। अंत मे वैशाली मे बुद्ध ने संघ के द्वार महिलाओ के लिए खोल दिए और महाप्रजापति गोतमी पहली महिला बनी जिसने बोद्ध संघ मे प्रवेश लिया।
  • रानी नागनिका
रानी नागनिका सातवाहन वंश के राजा शातकर्णी प्रथम की पत्नी थी। यह भागवत धर्म की अनुयायी थी और इन्होने नानाघाट के अभिलेख लिखवाया थे। शातकर्णी की मृत्यु के बाद इन्होने अपने अल्पवयस्क पुत्रो की संरक्षिका के तोर पर साम्राज्य पर राज किया।
  • रजिया सुल्तान (1236-39)
रजिया सुल्तान गुलाम वंश के दुसरे सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी और उनकी उत्तराधीकारी थी। रजिया सुल्तान दरबार मे बुर्का डाले बिना आती,शिकार खेलती और सेना का नेतृत्व भी करती। वजीर निजाम-उल-मुल्क जुनैदि ने इनके सत्तारोहण का विरोध किया लेकिन वजीर को सुल्तान ने हरा दिया और वो भाग गया। इन्होने लाहोर के विद्रोह का दमन किया और सरहिंद जाते समय एक आंतरिक बगावत के कारण इनको कैद कर लिया गया परंतु कैद मे अल्तुनीया ने इनसे निकाह कर लिया। इन दोनो ने मिलकर दिल्ली को पुन जितने का प्रयास किया परंतु असफल रहे। अंत मे डाकुओ ने रजिया सुल्तान को मार दिया।इनके बारे मे कवि मिन्हाज सिराज कहता है कि"वह विवेकमयी, लोकोपकारी, अपने राज्य की हितैषी, न्याय करने वाली, प्रजापालक और महान यौद्धा थी।
  • मीराबाई
मीराबाई का जन्म 1498ई. मे मारवाड रियासत के मेडता जागीर के रतन सिंह की पुत्री के रूप मे हुआ। यह बचपन से ही कृष्ण भक्ति मे लगी रहती थी। इनका विवाह मेवाड के महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से कर दिया गया परंतु विवाह के कुछ समय पश्चात भोजराज की मृत्यु हो गई।राजपरिवार के सदस्य चाहते थे की वे सती हो जाए परंतु मीराबाई ने स्पष्ट मना कर दिया और कहाँ की अब वे कृष्ण भक्ति करेगी।उनके पति के छोटे भाई राणा विक्रमादित्य को इनकी कृष्ण भक्ति सेऐतराज था इसलिए उसने कई बार मीराबाई को मारने का प्रयास किया। इन सब यातनाओ से तंग मीराबाई मेवाड छोडकर मेडता चली गई और मेडता से वो वृन्दावन गई और अपने अंत समय मे वे द्वारक रही।
               मीराबाई एक सच्ची विद्रोही थी उन्होने तत्कालीन समाज मे व्यापत पर्दा प्रथा और सती प्रथा का त्याग करके समाज को बता दिया की स्त्री का सर्वेसर्वा उसका पति नही होता और मृत्यु के पश्चात भी एक स्त्री अपना जीवन जीने की अधीकारी है।
  • पन्नाधाय
पन्नाधाय मेवाड के महाराणा सांगा की पत्नी रानी कर्मावती की दासी थी। सन् 1535 मे गुजरात के बहादुरशाह ने मेवाड पर आक्रमण किया,तब रानी कर्मावती ने पन्नाधाय को अपने सबसे छोटे पुत्र उदयसिंह को सोपकर जौहर कर लेती है।इस युद्ध के कुछ समय बाद मेवाड के सामंत एक होकर पुनः चितौड को जीत लेते है और विक्रमादित्य को राणा बना देते है। विक्रमादित्य एक अयोग्य शासक था इस कारण से दासीपुत्र बनवीर ने षडयंत्र करके उसकी हत्या कर दी और उदयसिंह को मारने के लिए वो नंगी तलवार लेकर उसके कक्ष की तरफ जाने लगा।यह बात पन्नाधाय को पता चल जाती है तब वे उदयसिंह के स्थान पर अपने पुत्र चन्दन को सुला देती है और उदयसिंह को महल के बाहर भेज देती है। जब बनवीर वहा पहुचा तो उसने सोते हुए चन्दन को उदयसिह समझ कर उसकी हत्या पन्नाधाय के सामने कर देता है।
                  पन्नाधाय का यह पुत्र बलिदान विश्व इतिहास मे शायद इकलोता उदहारण है और इस बलिदान के कारण ही भारत मे महाराणा प्रताप जैसा वीर पुत्र पैदा हुआ।


  • रानी दुर्गावती 
                 
 Rani durgawati
              
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 में कालिंजर के चंदेल राजा कीरत राय की बेटी के रूप में हुआ। बचपन से हे रानी दुर्गावती वीर और साहसी थी। रानी दुर्गावती का विवाह गोंड वंश के राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह से हुआ। सन 1545 में रानी दुर्गावती का एक बेटा हुआ जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। दुर्भाग्यवस दलपत शाह की मृत्यु 1550 में हो गई और वीर नारायण उस समय बहुत छोटा था अतः रानी उसकी संरक्षिका के तोर पर राज करने लगी। 
                                     रानी दुर्गावती के राज्य पर मालवा के सुल्तान बाजबहादुर ने कई बार हमला किया परन्तु वो हर बार हार गया इस कारण रानी के ख्याति बहुत बढ़ गये। सन 1562 में मुग़ल बादशाह अकबर ने मालवा पर आक्रमण कर उसे जीत लिया तब रानी दुर्गावती के राज्य की सीमा तक अकबर का साम्राज्य फेल गया अतः इन दोनों राज्यों के मध्य युद्ध होना तय था।  
                                                                                अकबर ने आसफ खाँ के नेतृत्व में रानी के खिलाफ युद्ध के लिए सेना भेजी परन्तु इस युद्ध में आसफ खाँ की पराजय हुए। इसके कुछ वर्षो बाद अकबर ने पुनः आसफ खाँ के नेतृत्व में सेना भेजी और 24 जून 1564 को रानी और आसफ खाँ की सेना के मध्य युद्ध हुआ और इस युद्ध में रानी दुर्गावती ने पुरुष वेश धारण करके युद्ध किया और जब वे बुरी तरह से घायल हो गयी तब उन्होंने पकड़े जाने से अच्छा मृत्यु का वरन करना उचित समझा और उन्होंने अपने सिने में कटार मर दिया। 
                                                             रानी दुर्गावती ने स्वतंत्र जीवन जिया और अपनी स्वतंत्रता के रक्षा में अपने प्राण भी दे दिए। 

  • हाड़ी रानी 

हाड़ी रानी का जन्म बूंदी (राजस्थान ) के हाडा राजपूत राजवंश में हुआ था। इनका विवाह मेवाड़ के सलूम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुंडावत  के साथ हुआ। इनके विवाह के कुछ समय पस्चात मेवाड़ के महाराणा राज सिंह ने रावत चुंडावत को औरंगज़ेब की सेना से युद्ध करने के लिए बुला दिया। तब रावत रतन सिंह युद्ध  करने के लिए रवाना हुए तभी वे अचानक रुके और अपने विश्वस्त सेवक को भेजकर रानी से उनकी कोई निशानी देने को कहा। यह बात सुनकर हाड़ी रानी ने अपने पति को अपने मोहपाश में बंधा पाया और उन्हें लगा की शायद इस मोहपाश के कारण उनके पति युद्ध में वीरता से न लड़ पाए। अतः उन्होंने अपनी दासी से तलवार मगवाई और अपना  सर  काटकर रावत जी को निशानी रूप में प्रदान  दिया। अपनी रानी के इस अनोखी निशानी को देखकर रावत जी  कर्तव्य का बोध हुआ और उन्होंने रानी  के सिर को गले में बांधकर युद्ध में मुग़लो  सिरों को काटा और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए। इस युद्ध में महाराणा की विजय हुई।
                                                           
Hadi rani cuts her head for giving momentum to Rawat Chudawat
                                                           हाड़ी रानी की कहानी उन सब लोगो के मुँह पे ताला जड़ देती है जो यह कहते है की स्त्री पुरुष के कर्तव्यपथ में बाधा है। इन्होने संसार को बता दिया स्त्री नहीं पुरुष का मोह उसके कर्तव्यपथ में बाधा है।

  •  अमृता देवी बिश्नोई 
                                         
amrita devi saving the tree from a royal soldier
 
अमृता देवी कोई रानी या महारानी नहीं थे ये एक आम महिला थी जिन्होंने अपने प्रकृति प्रेम के कारण इतिहास में नाम लिखवा दिया। सन 1730 में मारवाड़ राज्य (वर्तमान जोधपुर और उसके आसपास का क्षेत्र ) के महाराजा अभय सिंह ने राजकीय उत्सव के लिए खेजड़ी की लकड़ी लाने का आदेश अपने सेनिको को दिया। तब सैनिको ने खेजड़ली गाँव से खेजड़ी के पेड़ काटने की सोची और वे खेजड़ली पहुंचे और पेड़ कटाने लगे। यह देखकर गाँव की बिश्नोई महिला अमृता देवी ने उन सेनिको को रोकने का प्रयास किया परन्तु राजाज्ञा के मद में चूर सेनिको ने अमृता देवी की कोई बात नहीं सुनी तब अमृता देवी ने अपनी तीन बेटियों(असू, रतनी और भागु ) के साथ मिलकर पेड़ो से चिपक गए और अमृता देवी बोली के "सिर साठे रुख रहे तो भी सस्ता जान "(अर्थ -अगर सिर कटाकर भी एक पेड़ बचता है तो इसे भी सस्ता मानना चाहिए। यह सब देखकर भी उन शक्ति के मद में चूर सेनिको ने उनके सिरों को पेड़ समेत काट दिया। इस बता को जब लोगो ने सुना तब असंख्य बिश्नोई लोगो ने भी पेड़ो के रक्षा के लिए अपने प्राणो की आहुति दे दी। 



  • रानी लक्ष्मीबाई 
                                              
rani Lakshmibai

रानी लक्ष्मीबाई जो आज झाँसी की रानी नाम से प्रसिद्ध है का जन्म 19 नवंबर 1828 में वाराणसी में हुआ था। इनके पिता श्री मोरपंत ताम्बे बिठूर के पेशवा बाजीराव के वहाँ सेवा करते थे। रानी लक्ष्मीबाई को बचपन से ही घुड़सवारी , शास्त्रसंचालन और आत्मरक्षा के सभी गुर सिखाए गए थे। सन 1842 में लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवलकर से कर दिया गया, कुछ समय पश्चात उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम दामोदर राव रखा गया परन्तु मात्रा चार महीने बाद उस पुत्र की मृत्यु हो गई। दामोदर राव की मृत्यु के कुछ समय बाद रानी लक्ष्मीबाई और उनके पति ने आनंद राव नाम के लड़के को अपने रिश्तेदार से गोद लिया। सन 1853 में राजा गंगाधर की मृत्यु हो गई तब लॉर्ड डलहौज़ी ने 'व्यपगत के सिद्धांत ' के तहत झाँसी को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया और आनंद राव को राजा का उत्तराधिकारी नहीं माना। सन 1854 में ब्रिटिश सरकार ने एक गज़ट जारी करके झाँसी को अपने अधीन करने की कोशिश करी परन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी देने से माना कर दिया। सन 1857 में जब पुरे देश में अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ बगावत हो गयी तब रानी ने झाँसी में बगावत का मोर्चा संभाल। जनवरी 1858 में सर हुज ने झाँसी पर हमला किया और किले पर अपना अधिकार कर लिया, रानी अपने दत्तक पुत्र के साथ वहाँ से निकल गए और कल्पी जाकर तात्या तोपे से मिली। 17 जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर के निकट अंग्रेज़ो से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गई।
Read - झाँसी की रानी कविता 
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