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Monday, 5 November 2018

Five Facts You Never Knew About Bhamashah in hindi

Rajasthan का इतिहास में शौर्य गाथा ,वीरता , देशभक्ति है और यहाँ के इतिहास में यहाँ के राजे महाराजाओ द्वारा राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व बलिदान देने की अनेको कहानिया है।  लेकिन क्या Rajasthan में क्या सिर्फ राजे रजवाड़ो की ही कहानियाँ है ? क्या Rajasthan में व्पारियो का इतिहास में कोई नाम नहीं है ? तो चलये जानते है Rajasthan के व्यापारी वर्ग के शिरोमणि जिन्होंने अपने राष्ट्र के नाम अपनी पूरी सम्पति दान कर दी और उनसे जुडी कुछ ऐसी बाते जो आपको बहुत कम लोग बता पाएगे।
                                                                          आज इस पोस्ट में हम जानेगे Rajasthan के कर्ण कहे जाने वाले भामाशाह के बारे में और जानेगे भामाशाह से जुडी कुछ महत्व की बाटे जो बहुत कम लोग जानते है। जानने के लिए पुरे पोस्ट को जरूर पढ़े। 

भामाशाह का जन्म और जीवनी 

Rajasthan के दानवीर भामाशाह  का जन्म सन 1542 में एक जैन परिवार में हुआ था और मेवाड़ के राणा सांग ने भामाशाह के पिता भारमल कावड़िए को रणथम्बोर किले का क़िलेदार बनाया था और राणा उदयसिंह ने इनके पिता को अपना प्रधान मंत्री बनाया था। भामाशाह उदयसिंह के पुत्र मेवाड़ शिरोमणि महाराणा प्रताप के बचपन से अच्छे मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र थे।
                                                                            सन 1572 में जब राणा उदयसिंह की मृत्यु हो गई और महाराणा प्रताप मेवाड़ के राजसिंहासन पर बैठे। महाराणा प्रताप के समकालिन दिल्ली के शहंशाह अकबर था। अकबर में Rajasthan के लगभग सभी राजा महाराजा को अपने अधीन कर लिया था परन्तु मात्र मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। अकबर ने महाराणा प्रताप को मानाने के लिए तीन संधि प्रस्ताव भेजे लेकिन महाराणा प्रताप ने तीनो प्रस्तावों को ठुकरा दिया अतः 18 जून 1576 में हल्दीघाटी के मैदान में मानसिंह के नतृत्व में अकबर की सेना और महाराणा प्रताप की सना के बेच युद्ध हुआ।यह युद्ध अनिर्णायक रहा क्योकि इसमें न महाराणा अकबर की सेना को हरा पाए और न ही अकबर महाराणा प्रताप को पकड़ पाया। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की आर्थिक स्थति बहुत दयनीय हो गई थी और इस कारण वे अपने सेना का क्या अपने परिवार का भी पालन करने में असमर्थ हो चुके थे। इस विकट परिस्थति में भी महाराणा प्रताप ने अकबर के अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया  और संघर्ष करने का निर्णय लिया। लेकिन सेना संगठित करने के लिए धन की आवश्यकता थी परन्तु धन वे लाते कहा से। महाराणा की इस विकट परिस्थति में उनके बचपन के मित्र भामाशाह ने उनको अपनी सम्पति दान कर दी और इस सम्पति के बलबूते महाराणा प्रताप ने अकबर से अपना संघर्ष जारी रखा। भामाशाह  दान दिया उसके कारण वे इतिहास में अमर हो गए और आज भामाशाह नाम एक दानी व्यक्ति का पर्याय बन गया है। भामाशाह की मृत्यु सन 1600 में हुए थी।

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भामाशाह से जुड़े पांच तथ्य जो आपको जानने जरूरी है। 

  • भामाशाह हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा के एक विश्वस्त सेनापति थे। ये न सिर्फ एक कुशल व्यापारी थी अपितु ये एक  सेनानायक , वीर, साहसी, नितिज्ञ, कुशल प्रबंधक, स्वामिभक्त, उदारमना, योग्य प्रशासक, देशभक्त भी थे। 
  • भामाशाह ने महाराणा प्रताप को जो दान दिया उसका पूरा हिसाब कुछ इस प्रकार था की उसमे कुल 20000 सोने के सिक्के थे और 2500000 चांदी के सिक्के थे। 
  • सन 1578 में भामाशाह ने और उनके भाई ताराचंद ने मेवाड़ की बिखरी सैन्य शक्ति को एकत्रित कर   मुग़ल सूबे मालवा पर हमला किया और इस हमले में मालवा में इन्होने खूब लूट मचाई और वहाँ से काफी धन लूट कर मेवाड़ के महाराणा को दे दिया। 
  • भामाशाह को महाराणा प्रताप ने भामाशाह को राजकीय खजाने का कोषध्यक्ष बनाया और ताराचंद को गोडवाड़ का ठाकुर बनाया। 
  • भामाशाह के नाम पे Rajasthan सरकार ने 15 अगस्त 2014 को नई योजना का नाम "भामाशाह योजना " रखा गया। सन 2000 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट पे भामाशाह का नाम पे निकाला था। 
आपको यह पोस्ट किसी लगी कमेंट करके बताए। 

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