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Sunday, 3 February 2019

Samudragupta Bharat ka ajay shasak

Samudragupta भारत का एक ऐसा शासक था, जो अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा। Samudragupta ने भारत के ऐसे युग की स्थापना की जो आज भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग कहाँ जाता है।
आज इस पोस्ट में हम इसी महान योद्धा, कलाप्रेमी और साहित्यप्रेमी शासक samudragupta के बारे में जानेगे। 

गुप्त साम्राज्य से पहले भारत 

चन्द्रगुप्त मौर्य ने जिस मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी उसने भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में बंधा पर जब इस साम्राज्य का पतन हुआ तो उसके बाद हमारा देश फिर से अलग अलग राज्यों में बट गया। 200 b. c से 300A.D का समय भारतीय इतिहास में मौर्योत्तर काल कहाँ जाता है इस काल में शुंग वंश,सातवाहन वंश जैसे भारतीय वंशो ने और यवन, शक और कुषाण जैसे विदेशी शासको ने राज किया। इस काल में पुष्यमित्र शुंग, गौतमीपुत्र  शातकर्णि और कनिष्क जैसे अच्छे राजा हुए परन्तु ये सब भारत को राजनैतिक एकता देने में सफल नहीं हुए। 

गुप्त वंश की उत्पति 

गुप्त वंश की उत्पति के बारे में विद्वानों में मतभेद है। डॉ गोरीशंकर ओझा ने इन्हे क्षत्रिय माना है और हेमचन्द्रराय चौधरी ने इन्हे ब्राह्मण माना है लेकिन रोमिला थापर, रामशरण शर्मा ने इन्हे वैश्य माना है। अधिकांश विद्वान ने इन वैश्य माना है। 
            गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था परन्तु चन्द्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण करी और इसने ही अपने आप को स्वतंत्र शासक घोषित किया और स्वतंत्र गुप्त साम्राज्य की स्थापना करी। 

Samudragupta की जीवनी 

                                               
samudragupta
समुद्रगुप्त 

प्रारंभिक जीवन 

Samudragupta, चन्द्रगुप्त प्रथम  और रानी कुमारदेवी का पुत्र था। समुद्रगुप्त  बचपन से ही बहुत मनोहर था उसने कम समय ही शस्त्र संचालन , अस्त्र संचालन सीख लिया। 

उत्तराधिकार लिए युद्ध 

चन्द्रगुप्त ने  जीवन काल  में ही समुद्रगुप्त को शासक बना दिया और  स्वं ने सन्यास ले लिया। लेकिन उसके भाइयो  विरोध किया इसलिए समुद्रगुप्त  भाइयो से युद्ध करना पड़ा और अंत में वह विजय हुआ। 
समुद्रगुप्त का शासन काल 340 A.D. से लेकर 380 A.D तक चला। 

समुद्रगुप्त की विजय  

उत्तर भारत पर प्रथम  आक्रमण 

समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम गंगा यमुना दोआब के राज्यों  किया। इसने पद्मावत के राजा नागसेन को हराया और फिर पाटलिपुत्र के कोटकुल राजा को हराया और पाटलिपुत्र  पर अधिकार कर लिया। पाटलिपुत्र पर अधिकार करने से समुद्रगुप्त की साम्राज्य विस्तार की इच्छा और प्रबल हो गई और उसने दिग्विजय अभियान का आरम्भ किया। 

उत्तर भारत पर पुनः आक्रमण 

प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त  उत्तर भारत के 9 राज्यों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया था  सभी राजाओ को राज्यों को गुप्त साम्राज्य में मिला दिया गया। 
समुद्रगुप्त ने जिन 9 राजाओ  हराया उनके नाम है -:
  1. रुद्रदेव 
  2. मतील 
  3. नागदत्त 
  4. चन्द्रवर्मन 
  5. गणपति नाग 
  6. नागसेन 
  7. अय्यूत 
  8. नन्दिन 
  9. बल शर्मा

  अटवी राज्यों पर आक्रमण 

उत्तरी भारत की विजय के बाद समुद्रगुप्त ने विंध्याचल पर्वत के आसपास के अटवी राज्यों पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त की। इन अटवी राज्यों में जंगली जातिया निवास करती थी। यह अटवी राज्य गाज़ीपुर से लेकर  जबलपुर तक फैले थे। इन राज्यों के राजा के प्रति समुद्रगुप्त ने परचारिकीकृत की निति को अपनाया, इस निति के तहत वह उन राज्यों को अपना सेवक बना देते थे। इन राज्यों को जितने से उसके दक्षिण के राज्यों को जितने का मार्ग प्रशस्त हो गया। 

दक्षिण भारत पर आक्रमण 

अटवी राज्यों को जितने के बाद समुद्रगुप्त ने दक्षिण के राज्यों पर हमला किया और इन राज्यों को भी पराजित कर दिया। जिन दक्षिणी राज्यों को उसने हराया उन राज्यों के नाम है-:
  1. कौशल का महेंद्र 
  2. महाकांतार का व्याघ्रराज 
  3. पिष्टपुर का महेन्द्रगिरि 
  4. कोटूर का स्वामीदत्त 
  5. कांची का विष्णुगुप्त 
  6. अवमुक्त का नीलराज 
  7. वेगी का हस्तिवर्मा 
  8. पालक्क का उग्रसेन 
  9. देवराष्ट्र का कुबेर 
  10. कुशस्थलपुर का धनजय 
समुद्रगुप्त ने कूटनीति का प्रयोग करके इन राज्यों के प्रति धर्म विजय की निति अपनाई इस निति के अनुसार वो हारे हुए राजा के राज्यों को अपने साम्राज्य में नहीं मिलता लेकिन उन राज्यों को हमेशा समुद्रगुप्त को कर देना पड़ता था। 

सीमांत प्रदेशो और गणराज्यो पर विजय 

समुद्रगुप्त की सैनिक शक्ति को देखकर सीमांत प्रदेशो और गणराज्यो ने बिना किसी युद्ध के अधीनता स्वीकार कर ली। वो सीमांत प्रदेश जिसने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली वो थे -:
  1.  समतट 
  2.  डवाक 
  3. कामरूप 
  4. नेपाल 
  5. कात्रिपुर
गणराज्य जिन्होंने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करि वे थे -:
  1. मालवा 
  2. आर्जुनायन 
  3. योधेय 
  4. माद्रक 
  5. आभीर 
  6. प्रार्जन 
  7. सनकानिक 
  8. खरपारिक 

समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार 

samudragupta
source ipfs
ऊपर दिए गए नक़्शे ने फीका नीला रंग का क्षेत्र है वो सभी समुद्रगुप्त ने विजय किया था। डॉ आर. सी. मजूमदार के अनुसार समुद्रगुप्त का साम्राज्य में कश्मीर, पश्चिमी राजस्थान, सिंध और गुजरात को छोड़ कर पूरा भारत सम्मेलित था और छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा पूर्वीतट के साथ साथ दक्षिण  पिंगलपट सम्मेलित थे। 

अश्वमेघ यज्ञ 

समुद्रगुप्त ने अपनी भारत विजय के बाद उसने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। इस आयोजन में समुद्रगुप्त ने खूब दान पुण्य किया और सोने के सिक्को को जारी किया।  इन सिक्को के एक  तरफ यज्ञ के अश्व की मूर्ति है और दूसरी तरफ समुद्रगुप्त की  महारानी चवर लिए खड़ी है और उस सिक्के पर लिखा है "अश्वमेघ पराक्रमण "

समुद्रगुप्त द्वारा जारी किये गए सिक्के 

समुद्रगुप्त ने अपने राज्य काल में 6 प्रकार के सोने के सिक्के जारी किये 
  1. ध्वज धारी - यह समुद्रगुप्त का सर्वाधिक प्रसिद्ध मुद्रा है। इस मुद्रा ने इनको 100 युद्धों  विजेता बताया गया है। 
  2. धनुर्धारी प्रकार - इस मुद्रा  समुद्रगुप्त धनुष धारण किए हुए है और इस मुद्रा पर इसकी उपाधि "अप्रतिरथ " अंकित है। 
  3. परशुधारी प्रकार - इस पर राजा परशु धारण किये हुए दर्शाया गया है। 
  4. अश्वमेघ प्रकार -  इस मुद्रा को समुद्रगुप्त  ने अश्वमेघ यज्ञ के बाद जारी किया  था। 
  5. व्याघ्र निः हता प्रकार - इस मुद्रा के माध्यम से समुद्रगुप्त का आखेट प्रेम दिखता है और इस मुद्रा पर "व्याघ्रपराक्रम" और  "राजा समुद्रगुप्त" की उपाधि मिलती है। 
  6. विणा वादन प्रकार - इस मुद्रा में समुद्रगुप्त को विणा बजाते हुए दिखाया गया है। इस मुद्रा के माध्यम से हमें समुद्रगुप्त का कला प्रेम दीखता है। 

समुद्रगुप्त का चरित्र चित्रण 

  1. वीर योद्धा - समुद्रगुप्त एक वीर और पराक्रमी शासक था। उसने उत्तर भारत के 9 राज्यों और दक्षिण भारत के 12 राज्यों को पराजित किया। इसके साथ हे उसने अटवी राज्यों को हरा कर एक अखंड भारत का निर्माण करने की कोशिस की। उसने अश्वमेघ यज्ञ करके अपनी शक्ति  प्रदर्शन किया। 
  2. योग्य शासक -समुद्रगुप्त न सिर्फ एक वीर योद्धा अपितु एक योग्य शासक भी था। उसने अपने प्रशासन को सुव्यवस्थीत बनाया और अपने राज्य में शांति  की स्थपना करि। यह एक प्रजावत्सल राजा थे इसलिए ये हमेशा अपनी प्रजा की नैतिक और भौतिक प्रग्रति  लिए प्रयत्नशील रहते थे। 
  3. कूटनीतिज्ञ - समुद्रगुप्त एक  कूटनीतिज्ञ थे ,वे समय के हिसाब से आचरण करना जानते थे। इन्होने जब दक्षिण विजय किया  तब उन्होंने उत्तर भारत की तरह उन राज्यों को अपने साम्राज्य में सम्मलित नहीं और उन्हें अपना करद बना कर छोड़ दिया। ऐसा इन्होने इसलिए किया क्योकि उस समय यातायात साधन इतने नहीं थे और पाटलिपुत्र से दक्षिण में राजव्यवस्था संभालना असंभव था। 
  4. साहित्य और कला के संरक्षक - समुद्रगुप्त न सिर्फ राजकार्यो में अपितु कला में भी बहुत माहिर था। इसलिए इन्हे कविराज भी कहा जाता था। समुद्रगुप्त ने कई विद्वानों को  संरक्षण दिया। हरिषेण , असक और वशुबन्ध इनके दरबार के विद्वान् थे। 
  5. धर्म-सहिष्णु - समुद्रगुप्त स्वं हिन्दू धर्म का समर्थक था और इसके समय में भागवत धर्म का बहुत विकाश हुआ। लेकिन उसने कभी भी अपने साम्राज्य में दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ कभी को निर्णय नहीं लिया अपतु उसने बोधगया में बौद्ध विहार बनाने की अनुमति दी। इसके साथ ही इसके दरबार के असक और वशुबन्ध दोनों ही बौद्ध धर्म के अनुयाई थे। 

क्या समुद्रगुप्त को भारतीय नेपोलियन कहना सही है?


डॉ बी. ए. स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारतीय नेपोलियन कहा था। उसके बाद कई विद्वान् इस बात से सहमत होकर इस बात को मानने लग गए और फिर स्कूल की किताबो में भी  समुद्रगुप्त को नेपोलियन कहाँ जाने लगा जिस कारण से आज उसे  अधिकांश लोग भारतीय नेपोलियन कहते है। लेकिन अगर सही मायने में नेपोलियन और समुद्रगुप्त की तुलना की जाए तो शायद यह बात सामने आ जाएगी की समुद्रगुप्त के सामने नेपोलियन कुछ भी नहीं था। ऐसा इसलिए क्योकि नेपोलियन वॉटरलू की लड़ाई में हारा था लेकिन समुद्रगुप्त आजीवन अजय रहा और कोई भी युद्ध नहीं हारा। किसी बात को इसलिए मान लेना की वो सही है क्योकि वो किसी अंग्रेजी विद्वान् ने कही है तो यह न सिर्फ हमारी भारतीयता पर परन्तु अपने उन समुद्रगुप्त जैसे महान पूर्वजो के सम्मान पर कलंक है। 
इस पोस्ट में मेने आप को भारत के एक महान सम्राट समुद्रगुप्त के बारे में बताया और यह भी बताया की क्या उन्हें नेपोलियन कहना सही है या नहीं। अब आप की बारी है अगर आपको यह पोस्ट पसंद आए तो शेयर जरूर करेगा  कमेंट करके बताए की आपको और किस व्यक्ति पर पोस्ट चाहिए। 

Source 

                



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